सामना संवाददाता / मुंबई
सीटी होठों को सिकोड़कर निकाली गई एक साधारण ध्वनि है, लेकिन इसी सीटी को संगीत की एक अनूठी विधा में बदलकर रत्नागिरी जिले के दापोली तालुका के इलणे गांव के निवासी रुपेश मुरुडकर वर्तमान में मुंबई के सांताक्रुज (वाकोला) में रहने वाले ने अपनी विलक्षण सीटी वादन कला के दम पर राज्य, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान और लोकप्रियता अर्जित की है।
रुपेश को यह कला अपने स्वर्गीय पिता हरिश्चंद्र गोविंद मुरुडकर से विरासत में मिली। बचपन से ही सीटी वादन के प्रति रुचि रखने वाले रुपेश हिंदी और मराठी फिल्मों के गीतों से लेकर भावगीत, भक्तिगीत, कोलीगीत, गजल, भजन और मंगलाष्टक तक को सीटी के माध्यम से सुरबद्ध कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।
उनकी प्रतिभा को पहली बड़ी पहचान रोटरी क्लब पार्लेश्वर द्वारा आयोजित ‘कला दर्पण फेस्टिवल’ से मिली। स्मिता दत्तात्रय पुराणिक के प्रयासों से उन्हें अपनी कला प्रस्तुत करने का अवसर मिला।
रुपेश मुरुडकर ने पुणे में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सीटी वादन प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। इस सफलता ने उन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर नई पहचान दिलाई। कई संस्थाओं ने उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा है। नवभारत छात्रालय कुणबी सेवा संस्था के ७५वें स्वर्ण महोत्सव में पूर्व केंद्रीय मंत्री अनंत गीते के हाथों उनका सम्मान किया गया। इसके अलावा उन्हें श्रमजीवी संस्था माणगांव का ‘श्रमजीवी भूषण’, प्रियदर्शिनी फाउंडेशन का ‘मानवाधिकार कला भूषण’, आर्ट बिट्स पुणे का कला सम्मान, कोकणदीप संस्था दापोली का ‘कोकण शिरोमणी’ तथा रेलवे यूनियन की ओर से ‘भीमरत्न’ और ‘संत रोहिदास महाराज’ पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं।
उनके कई वीडियो, एल्बम और रिकॉर्डिंग्स प्रकाशित हुए तथा ‘Rupesh Murudkar’ नामक यूट्यूब चैनल के माध्यम से उनकी कला देश-विदेश के संगीत प्रेमियों तक पहुंच रही है।
