आहट

घने कोहरे ने अपना आंचल समेटा,
गुनगुनी धूप खिली,
कुछ मस्ती में हवा बही,
नील गगन दिया दिखाई।

कोटर में दुबके खग,
हौले-हौले खोल रहे पंख,
लो अब ऊंची उड़ान लगाई।

निष्ठुर धुंध ने थी जैसे
कड़ी सजा सुनाई।

प्रकृति ने भोर सन्धि बेला,
प्राची में लाली की आभा फैलाई।

तितलियों ने नवरंगी पंख समेटे, ली अंगड़ाई।

भंवरों ने मृदुल तान गुनगुनाई।

पुष्पों की ओस से बोझिल डाली,
झार रहीं बूंदों को,
कुछ सीधी पड़ी दिखाई।

पुरवाई लगी बहने,
कुछ ले गरमाई।

धूप छांव की अठखेलियां कर रहा भानू,
मेघों से कर रहा लड़ाई।

तरु फुन्गी पर दिखी,
कोमल किसलय की फुटाई।

चित हुए हर्षित सबके,
मधुमास की आहट पड़ी सुनाई।

बेला विरदी।

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