ई राज
बंगलुरु के बाजारों में इन दिनों तकनीक की एक अद्भुत `जुगलबंदी’ देखने को मिल रही है। कल तक जो दुकानदार ग्राहकों को तौलकर टमाटर देते थे, आज वे अपने सिर पर आईफोन का ‘मुकुट’ (हेडबैंड) पहनकर रोबोट्स को ज्ञान बांट रहे हैं। सैन फ्रांसिस्को की महान कंपनियां भारत के गरीब रेहड़ी-पटरी वालों और दर्जियों के हुनर की इतनी कायल हो गई हैं कि उन्होंने पांच-पांच घंटे उनके सिर पर कैमरा बांधने का फैसला किया है। इसे कहते हैं, सच्चा सम्मान!
बिना कागज का `डिजिटल’ भरोसा
इस पूरी प्रक्रिया में `कागजी कार्रवाई’ जैसी पुरानी और उबाऊ परंपरा को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है। कोई लिखित कॉन्ट्रैक्ट नहीं, बस एक मौखिक वादा! और हां, डिजिटल इंडिया की रफ्तार को मैच करने के लिए, काम शुरू होने के दो दिन बाद ही भुगतान की शर्तें भी बदल दी जाती हैं। इसे ही तो कॉर्पोरेट जगत में `फ्लेक्सिबिलिटी’ कहते हैं।
गुरु-दक्षिणा में बेरोजगारी
तकनीक का यह मॉडल बेहद दूरदर्शी है। बेचारे फूल वाले और दर्जी बड़े चाव से रोबोट को सिखा रहे हैं कि बिना टमाटर कुचले वैâसे उठाना है और कपड़े को वैâसे सटीक मोड़ना है। वे बड़े गर्व से अपने `डिजिटल शिष्य’ को तैयार कर रहे हैं, जो कल को उन्हीं की दुकान पर बैठकर उन्हें कहेगा, `थैंक यू फॉर द ट्रेनिंग, अब आप घर जा सकते हैं।’ अपनी ही बेरोजगारी का सामान अपने हाथों (और सिर) से तैयार करने की ऐसी मिसाल दुनिया में कहीं और नहीं मिलेगी।
सबका विकास (सिर्फ रोबोट्स का)
थिंक टैंक नीति आयोग और विशेषज्ञ चिल्ला रहे हैं कि देश के ४९ करोड़ अनौपचारिक श्रमिकों के भविष्य का क्या होगा? लेकिन साहेब, जब रोबोट एकदम परफेक्ट तरीके से फूल की माला बनाना सीख जाएगा, तो इंसानों की क्या जरूरत? कम से कम रोबोट्स को तो रोजगार मिल रहा है! भारत के गरीब अपनी भूख भूलकर दुनिया को `स्मार्ट’ बनाने में जुटे हैं, इससे बड़ा परोपकार और क्या हो सकता है?
