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`महायुति’ के लिए ‘सफेद हाथी’ बने महामंडल …४३ प्रतिशत कर रहे घाटे का सामना, ५०,००० करोड़ रुपए का हो रहा नुकसान

-कर्मचारी बस कुर्सी गर्म करने में मग्न
-करदाताओं पर बढ़ता जा रहा बोझ

सामना संवाददाता / मुंबई
राजनीतिक भ्रष्टाचार और अक्षमता के कारण महायुति सरकार के लिए सरकारी महामंडल ‘सफेद हाथी’ बन गए हैं, जो जनता के पैसे पर भारी पड़ रहे हैं। राज्य के कुल महामंडलों में से ४३ फीसदी इस समय घाटे का सामना कर रहे हैं, जिससे सरकार को ५०,००० करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हो रहा है। राजनीतिक नियुक्तियां, अक्षमता, अत्यधिक कर्मचारी और पुरानी तकनीक ने इन्हें घाटे का गड्ढा बना दिया है। दूसरी तरफ इन महामंडलों में काम करनेवाले कर्मचारी सिर्फ अपनी कुर्सियां गर्म करने में व्यस्त हैं, जिसका सीधा बोझ ईमानदार करदाताओं पर पड़ रहा है। यह स्थिति न केवल वित्तीय अराजकता को दर्शा रही है, बल्कि यह भी साबित कर रही है कि जनहित के लिए बनी संस्थाएं किस तरह राजनीतिक खिलौना बनकर रह गई हैं। उल्लेखनीय है कि राज्य के ११० महामंडलों में से ४३ फीसदी घाटे से जूझ रहे हैं। इनमें से ९ फीसदी महामंडल ‘ना लाभ ना हानि’ के आधार पर चल रहे हैं। घाटे में चल रहे इन महामंडलों को ५० हजार करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान उठाना पड़ रहा है, जिसके कारण ये राज्य सरकार के लिए ‘सफेद हाथी’ साबित हो रहे हैं। बता दें कि राज्य के सरकारी महामंडल जनता के हित और विशिष्ट सेवाएं प्रदान करने के लिए स्थापित किए गए हैं। लेकिन अक्सर वे भारी घाटे में चलते हैं। ये महामंडल कभी भी लाभ में नहीं होते इसलिए इनका रखरखाव बहुत महंगा होता है और इनसे ज्यादा राजस्व भी नहीं मिलता। महायुति सरकार ने घाटे में चल रहे इन महामंडलों को बंद करने के पैâसले को नजरअंदाज कर दिया है।
ये हैं घाटे में आने के कारण
राज्य के इन महामंडलों के अध्यक्ष और निदेशक मंडलों पर अक्सर व्यावसायिक योग्यता की बजाय राजनीतिक सुविधा के अनुसार नियुक्तियां की जाती हैं। इससे कई निर्णय राजनीतिक दबाव में लिए जाते हैं, जिससे महामंडल को वित्तीय नुकसान होता है। इन सभी महामंडलों में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ने से ये घाटे में आ गए हैं। ये निगम अक्सर व्यावसायिक दृष्टिकोण और जिम्मेदारी से काम नहीं करते हैं। काम की गति धीमी होती है और लाभ की बजाय सरकारी खजाने पर निर्भर रहने की आदत पड़ जाती है। इसलिए अक्षमता इसका एक महत्वपूर्ण कारण बन गया है। इसके साथ ही कई महामंडलों में अतिरिक्त कर्मचारी हैं। कुछ जगहों पर आवश्यकता से अधिक कर्मचारी होते हैं, जिससे वेतन पर भारी खर्च होता है। सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन का बोझ भी इन पर होता है। इसलिए इसे घाटे में आने का एक प्रमुख कारण माना जाता है। ठीक से काम न करने के कारण कुछ महामंडल घाटे में आ गए होंगे। मंत्री छगन भुजबल ने कहा है कि कई महामंडलों एसटी जैसों का घाटे में होना कोई बड़ी बात नहीं है। कुछ महामंडल लोगों की सेवा के लिए ही बनाए गए हैं। मुझे नहीं लगता कि उनमें लाभ और हानि के बारे में सोचने की आवश्यकता है।

यह है इसका परिणाम
इन महामंडलों के घाटे में होने का बोझ अंतत: आम करदाताओं पर पड़ रहा है। राज्य की महायुति सरकार को इन महामंडलों को वित्तीय सहायता देने के लिए सार्वजनिक धन का उपयोग करना पड़ रहा है। यह पैसा शिक्षा, स्वास्थ्य या बुनियादी ढांचा जैसे अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर खर्च किया जा सकता था, लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है। ‘सफेद हाथी’ बन चुके इन महामंडलों की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए कठोर निर्णय लेना आवश्यक है। केवल कागजों पर मौजूद इन संस्थानों का पुनर्गठन, कुछ महामंडलों का निजीकरण या उन्हें पूरी तरह से बंद करना ही इसका उपाय हो सकता है, अन्यथा सरकारी खजाने पर यह बोझ ऐसे ही बढ़ता रहेगा।

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