राजन पारकर
बाहर से भाजपा, शिंदे गुट और अजित पवार गुट साथ दिख रहे हैं, लेकिन टिकट बंटवारे में भाजपा के बड़े भाई वाले तेवर से सहयोगियों में बेचैनी है। चर्चा है कि कई जगह उम्मीदवार महायुति के हैं, मगर मन से कार्यकर्ता अब भी अपने-अपने झंडे के लिए ही काम कर रहे हैं।
विदर्भ बना राजनीति का अखाड़ा
नागपुर, अमरावती, चंद्रपुर, यवतमाल और भंडारा-गोंदिया में विधान परिषद की लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं, बल्कि आगे के नगर निकाय और विधानसभा समीकरणों की रिहर्सल मानी जा रही है। महायुति में निर्दलियों की एंट्री ने कई उम्मीदवारों की नींद उड़ा दी है।
अंदरूनी धुसफूस फिर उजागर
एक ही खेमे में दो-दो दावेदारों और स्थानीय असंतोष ने अजीत पवार गुट के लिए असहज स्थिति बना दी है। चर्चा है कि सत्ता में हिस्सेदारी मिलने के बाद भी स्थानीय स्तर पर ‘किसका आदमी ऊपर जाएगा’ वाली लड़ाई खत्म नहीं हुई है।
हंसे या रोएं…!
महाराष्ट्र में इन दिनों राजनीति, प्रशासन और अपराध- तीनों ने मिलकर ऐसा तमाशा खड़ा किया है कि जनता समझ नहीं पा रही कि ताली बजाए, माथा पीटे या व्यंग्य पर हंसे। किसान कर्जमाफी की घोषणा से खुश है, नेता श्रेय लेने में व्यस्त हैं, चुनाव आयोग ब्रेक लगाने में लगा है और दूसरी तरफ ड्रग्स माफिया करोड़ों का जहर बनाकर युवाओं का भविष्य बेच रहे हैं।
शादी हो गई, बताना मत…!
सरकार कहती है कि कर्जमाफी का निर्णय हो चुका है। मंत्री कहते हैं कि तैयारी पूरी है। मुख्यमंत्री कहते हैं कि प्रक्रिया शुरू होगी, लेकिन घोषणा नहीं होगी! यह वैसा ही है जैसे बारात दरवाजे पर पहुंच जाए, दूल्हा घोड़ी से उतर जाए, पंडित मंत्र पढ़ने बैठे हों और कोई कहे- ‘शादी हो गई है, मगर अभी बताना मत!’ चुनाव आयोग की अपनी मजबूरियां होंगी, लेकिन आम किसान के लिए यह दृश्य हास्यास्पद है। उसे यह समझ नहीं आता कि यदि निर्णय हो चुका है तो घोषणा में कौन-सा ग्रहण लगा है? लोकतंत्र में कभी-कभी ऐसी परिस्थितियां पैदा होती हैं, जहां सच सामने खड़ा होता है मगर उसे बोलने की अनुमति नहीं होती।
मुंह पर तमाचा!
उधर, मुंबई पुलिस गुजरात में घुसकर करोड़ों रुपए का एमडी ड्रग्स कारखाना पकड़ती है। यह कार्रवाई प्रशंसनीय है, लेकिन इसके साथ एक भयावह प्रश्न भी खड़ा करती है। जिस देश में किसान दो लाख रुपए के कर्ज के लिए वर्षों संघर्ष करता है, उसी देश में ड्रग्स माफिया करोड़ों रुपये का जहर तैयार कर रहे हैं। किसान खेत में पसीना बहाकर कर्जदार बनता है और अपराधी नशा बेचकर करोड़पति। यह केवल अपराध नहीं, बल्कि व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है। ड्रग्स की हर खेप किसी युवा का भविष्य लूटती है, किसी परिवार की नींद छीनती है और समाज की रीढ़ तोड़ती है। इसलिए केवल कारखाना तोड़ना काफी नहीं, उन हाथों को भी बेनकाब करना होगा जो इस काले कारोबार को संरक्षण देते हैं।
जनता पूछ रही है…
किसान को राहत कब मिलेगी?
कर्जमाफी की घोषणा कब होगी?
ड्रग्स माफिया की जड़ें कहां तक जाती हैं?
और सबसे बड़ा सवाल- क्या सरकारें समस्याओं का समाधान करती हैं या केवल घोषणाओं, श्रेय और राजनीति का उत्सव मनाती हैं?
क्योंकि जनता अब भाषण नहीं, परिणाम देखना चाहती है। किसान के खाते में राहत पहुंचे, युवा के हाथ में रोजगार पहुंचे और अपराधी के हाथ में हथकड़ी पहुंचे- तभी लोकतंत्र की तस्वीर सुंदर दिखाई देगी। वरना इतिहास लिखेगा कि एक तरफ किसान कर्ज के बोझ तले दबा था, दूसरी तरफ ड्रग्स माफिया नोट गिन रहे थे और बीच में नेता श्रेय लेने में व्यस्त थे।
