मुख्यपृष्ठस्तंभमहाराष्ट्रनामा : ‘बारिश का पानी, व्यवस्था की पोल और सियासत की गहराई!'

महाराष्ट्रनामा : ‘बारिश का पानी, व्यवस्था की पोल और सियासत की गहराई!’

राजन पारकर

मुंबई की चमक के नीचे छिपा अंधेरा!
मुंबई को सपनों की नगरी कहा जाता है, लेकिन बारिश आते ही यह नगरी कभी नाले में बहती दिखाई देती है तो कभी मैनहोल में गिरती हुई।
महापौर निरीक्षण कर रही थीं, अधिकारी वैâमरे के सामने व्यवस्था का जायजा ले रहे थे और उसी वक्त मनपा का कर्मचारी खुले मैनहोल में जा गिरा। यह घटना सिर्फ एक कर्मचारी के गिरने की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के गिरने की तस्वीर है, जो हर साल बारिश से पहले ‘सब तैयार है’ का भाषण देती है। आश्चर्य यह है कि गड्ढे भरने वाली व्यवस्था खुद गड्ढे में गिर गई। अब सवाल यह नहीं कि कर्मचारी वैâसे गिरा, सवाल यह है कि जिम्मेदारी किस गड्ढे में जाकर छिप गई?
बादल बरसे तो दावे भी बहने लगे!
महाराष्ट्र में मानसून सक्रिय हुआ और मौसम विभाग ने भारी बारिश का इशारा दिया। १७ जिलों को सतर्क रहने की चेतावनी दी गई।
लेकिन महाराष्ट्र की पुरानी कहानी फिर सामने है- बारिश हर साल आती है, मगर तैयारी हर साल अचानक शुरू होती है। बारिश को देखकर प्रशासन ऐसे चौंकता है जैसे आसमान ने पहली बार पानी बरसाने का पैâसला किया हो। नाले, सड़कें और यातायात की समस्या देखकर लगता है कि बादलों से ज्यादा तेज गति से तो बहाने बहते हैं। अगर बारिश प्राकृतिक है तो जलजमाव और अव्यवस्था किसकी देन है- यह सवाल जनता पूछ रही है।
राजनीति की छाया में न्याय की तलाश!
बीड में विलास घुले हत्या प्रकरण ने कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। झगड़ा रोकने गए व्यक्ति की हत्या हो जाती है और उसके बाद न्याय पाने के लिए परिवार को घंटों संघर्ष करना पड़ता है। मामले में आरोप-प्रत्यारोप, राजनीतिक नाम और पुलिस कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ऐसी घटनाएं समाज को यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि आखिर आम आदमी की सुरक्षा किसके भरोसे है? आज हालत यह है कि एक तरफ मुंबई में आदमी मैनहोल से डर रहा है, दूसरी तरफ गांव में कानून-व्यवस्था के गड्ढे दिखाई दे रहे हैं।
कभी कहा जाता था- महाराष्ट्र प्रगतिशील राज्य है। लेकिन आज तस्वीर ऐसी है कि कहीं कर्मचारी मैनहोल में गिरता है, कहीं शहर पानी में डूबता है और कहीं इंसाफ के लिए परिवार को सड़क पर बैठना पड़ता है। व्यवस्था के भाषण ऊंचे हैं, मगर जमीन पर गड्ढे उससे भी गहरे हैं। यही है नए दौर का विकास- ऊपर से चमकदार, नीचे से खोखला!

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