मुख्यपृष्ठस्तंभमैथिली व्यंग्य: बलक दुख

मैथिली व्यंग्य: बलक दुख

डॉ. ममता शशि झा / मुंबई

काजल के संगी रीना के अपना संगे एकटा सेमिनार में चल लेल कहलकई जकर विषय छलई ‘हर परिस्थिति कोना खुश रहबाक चाही।’
काजल, रीना दिस देखि के कहलखिन ‘मुदा हम ते हर परिस्थिति में खुश रहई छी।’
रीना ‘तोरा के ओत गेला के बाद पता चलतउ जे लोक सब तोरा संगे केहन खराब व्यवहार करई छऊ आ ओहि परिस्थिति में कोना खुश रहबाक चाही।’
काजल ‘हमरा संगे घरक लोक सब बड़ नीक व्यवहार करई छथि, ते हमरा कोनो तकलिफ नहिं अछि, ताहि लेल हमरा जेबाक कोनो काज नहीं अछि। कोनो आन विषय पर अगर सेमिनार आयोजित हेतई जेना दोसरा के प्रसन्न कोना राखि ते हमरा ले चलिहें‌।’
रीना ‘इहे ते बात छई जे हमरा सबके ई बुझहे नहिं अबईया जे हमरा सबके संगे की खराब व्यवहार भे रहल अछि, हर परिस्थिति के स्वीकारके मानसिकता के कारण अपन अधिकार आ खुशी के बारे में सोचिते नहीं छी। बच्चे स ओहि साचा में ढालि देल जाईया, ओत गेला के बाद तोरा बुझ एतऊ जे तोहर परेशानी की छऊ
आ तू कतेक एडजस्टमेंट के रहल छहि हुनका सबहक संगे। आ ई एडजस्टमेंट खुशी, खुशी कोना करबाक चाही से ओ सब ट्रेनिंग देतऊ।
काजल ‘मुदा हमरा त कोनो एडजस्टमेंट नहिं कर
पड़इया।’ रीना ‘मोन खराब रहला के बादो काज कर पड़नाई, मोन मारि के सासुरक लोक के आवभगत केनाई आ तू ते नौकरी नहीं करई छही ते अपन शौख-मौज के लेल पाई भेट में एडजस्टमेंट कर परईत हेतऊ, स्त्री-पुरूख के लेल अलग-अलग नियम रहई छई हर घरमे ओहि ले के तकलिफ होअईत हेतउ, ओहि मे से कोना बाहर निकलि से सिखेतउ।
काजल ‘हमरा जीवन में कोनो एहन समस्या नहीं अछि, हमरा घर में कोनो तरहक रोक-टोक नहिं अछि, घरमे भानस बनाब सं ले के अन्य सबकाज के लेल नोकर-चाकर अछि आ ने कोनो काज लेल क्यो परेशान करईया, हम खुश छी, हमरा खुश रहके लेल कोनों ट्रेनिंग के काज नहि अछि।’
रीना ‘ओत चलु तो, ओत गेला के बाद पता चलत जे अहांके कोन दुख अछि आ ओहि मे खुश कोना रहबाक चाही।’
काजल बुझि गेलि जे बलधकेलो ई हमरा अपना संगे लईए जायत, कहलखिन ‘ठीक छई चलु।’
काजल के सेमिनार में गेला के बाद पता चललनि जे हुनका कुन‌-कुन‌ कारण सं दुखी हेबाक चाहियनि।
रीना हुनकर चेहरा के भाव देखि-देखि के प्रसन्न होई छलि।
आ काजल मोने-मोन सोचई छलि जे कतेको लोक के अहि तरहक सेमिनार के माध्यम से अनेरो के बलक दुखके देल जाई छई!

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