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मालवी कविता धरती का सूख्या होंठ

वरुण देवता तमारो
नी रियो वो घमंड,
घन घमंड गरजे नी,
उमस रा दिन बड़ा बंड।
धरती का ओंठ सूख्या,
ने सगला ताल ग्या सूख,
नदियां रोवे पण,
उनकी आंख्या जल ग्यो सूख।
किरषाण टकटकी लगाए
देखे आसमाण,
पण मेघा में नी हे
थोड़ी सी भी जाण।
तरसे सगली धरती,
ने कद मेघ बरसेगा,
तरस रिया हर जीव,
बरखा कद आवेगा।
दादुर, मोर, पपीहा,
सगला है श्रीहीन,
गला सबना सुखया,
ने ढूंढे रे जल बूंदीन।
राम वल्लभ गुप्त ‘इंदौरी’
इटारसी, मध्यप्रदेश

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