जब भी ससुराल जाता हूं,
मुसलसल एक खौफ
में रहता हूं।
हरदम ‘साले’ घेरे रहते हैं,
जीभ हूँ, दांतों के बीच
में रहता हूं।
एक सास थी, ठूंस-ठूंस कर खिलाती थी,
साले हैं! कोल्ड ड्रिंक भी
पैग की तरह नापते हैं।
खुद की बीवी, बीवी नहीं रहती,
जितने दिन ससुराल
में रहता हूं।
ससुराल सास से होती है,
साले-सालियों से नहीं।
बाग फूल से होता है,
पार्ट-टाइम मालियों से नहीं।
उनकी ना में ना,
हाँ में हाँ भरता हूँ।
‘आदर्श दामाद कैसे बनें’
किताब की सीरीज
लिख सकता हूं।
हवा हुए दिन सब,
‘मरजीना’ सा रक्स करते थे।
हम कभी अपने कस्बे के अलीबाबा थे,
अब तो सरेंडर किए ‘चालीस चोर’
सा रहता हूं।
ससुराल मेरी, मैं ससुराल का,
फिर भी कैसा दामाद? किसका दामाद?
ना जाने कब निकाल बाहर करें,
हारे हुए एम.पी. सा ‘लुटियन जोन’
में रहता हूं।
डाॅ. रवीन्द्र कुमार
