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कब कैसे है आती कविता

कब कैसे है आती कविता,
भीतर शोर मचाती कविता।।
कभी-कभी तो बड़े प्यार से,
शब्दों से टकराती कविता।।
भीतर के उत्तम विचार को,
हरदम बाहर लाती कविता।।
हवा और मौसम को पढ़ती,
कविता में ढल जाती कविता।।
जो सोए हैं उन्हें जगाकर,
अपना फर्ज निभाती कविता।।
राष्ट्र धर्म की बात चलाकर,
दुनिया को समझाती कविता।।
सदा अमंगल दूर हटाकर,
मंगल गान सुनाती कविता।।
अंधेरे से टकराती है,
सदा उजाला लाती कविता।।
संघर्षों में पली-बढ़ी यह,
इंकलाब है लाती कविता।।
युग की नब्ज पकड़ लेती है,
फिर तो खुद बन जाती कविता।।
जनहित वाले हर मुद्दे पर,
हरदम बनती जाती कविता।।
सच्चाई को दोस्त बनाकर,
भीतर ही मुस्काती कविता।।
जोखिम भी वह खूब उठाती,
मानवता है गाती कविता।।
राष्ट्रगीत के साथ तिरंगा,
मन ही मन फहराती कविता।।
दीन-दुखी के साथ खड़ी हो,
साहस खूब बढ़ाती कविता।।
जहां दर्द है वहीं पहुंचकर,
करुणा में ढल जाती कविता।।
जुल्म-सितम के बरखिलाफ वह,
स्वयं आग बन जाती कविता।।
शांति-व्यवस्था ले आने में,
सारा जोर लगाती कविता।।
हंसने-मुस्काने का अवसर,
समय-समय पर लाती कविता।।
बोझिल मन को राहत देकर,
आगे को बढ़ जाती कविता।।
मानवता के लिए तड़पती,
हरदम रोती-गाती कविता।।
-अन्वेषी

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