-इलाज के नाम पर बच्चियों का यौन शोषण
मनमोहन सिंह
‘चिल्लाओ मत जाया’! अगर आवाज बाहर गई, तो तुम्हारे अंदर की बुरी रूह हमेशा के लिए तुम्हें पागल कर देगी…’
पूर्वी लंदन की उस सर्द शाम, बंद कमरे के भीतर की हवा भारी थी। लोबान का धुआं आंखों में चुभ रहा था। १३ साल की ‘जाया’, जो लंदन में ही पैदा हुई थी और पली-बढ़ी थी, थर-थर कांप रही थी।
सामने सफेद लंबी दाढ़ी और चेहरे पर मखमली नूर ओढ़े मस्जिद का नामी इमाम अब्दुल हलीम खान खड़ा था। वही ‘मौलाना साहब’, जिसकी एक आवाज पर पूरा इलाका अदब से सर झुका देता था।
‘लेकिन मौलाना साहब… मुझे डर लग रहा है। मुझे अम्मी के पास जाना है…’ ‘जाया’ की आवाज रुआंसी हो गई। उसकी ब्रिटिश एक्सेंट वाली उर्दू में खौफ साफ था।
‘अल्लाह पर भरोसा रखो बच्ची,’ खान की आवाज इतनी नर्म थी मानो शहद टपक रहा हो। उसने जाया के सिर पर हाथ रखा, पर उस छुअन में जरा भी बुजुर्गियत नहीं थी। ‘तुम्हारे वालिद-वालिदा ने तुम्हें मेरे हवाले किया है। तुम्हारी रूह पर साया है। मैं जो कर रहा हूं, वो तुम्हें पाक करने के लिए है। ये अल्लाह का काम है।’
‘पर आप… आप मुझे ऐसे क्यों छू रहे हैं?’ ‘जाया’ ने पीछे हटने की कोशिश की।
मौलाना की आंखें पल भर के लिए सर्द हुईं, फिर वो मुस्कुराया, ‘ये रूहानी इलाज है ‘जाया’। अगर इस कमरे की बात बाहर गई, तो इलाज बेकार हो जाएगा। बुरी आत्माएं नाराज होकर तुम्हारे मां-बाप को मार डालेंगी। क्या तुम ऐसा चाहती हो?’
डर, धर्म और अंधविश्वास का ऐसा कॉकटेल बनाया गया कि १३ साल की मासूम का दिमाग सुन्न हो गया। ‘जाया’ चुप हो गई। और उस खामोशी की आड़ में मौलाना ने उसके बचपन को तार-तार कर दिया। हर बार की हैवानियत के बाद सिर्फ एक जुमला दोहराया जाता, ‘तुम अब पाक हो रही हो।’
खामोशी का अंत
‘जाया’ सालों तक इस खौफ में जीती रही कि अगर उसने मुंह खोला, तो वो गुनहगार कहलाएगी। उसे लगता था कि शायद कमी उसी में है। ‘जाया’ अकेली नहीं थी; उस बंद कमरे में न जाने कितनी ब्रिटिश-एशियन लड़कियों का बचपन कुचला गया था। अब बड़ी हो चुकी ‘जाया’ ने अपनी पहचान छुपाकर दुनिया के सामने आने का पैâसला किया। उसने एक मीडिया संस्थान से अपनी बातें साझा की।
‘वो कहता था कि उसके पास जादुई ताकत है,’ जारा ने कांपती आवाज पर मजबूत इरादों के साथ कहा। ‘लंदन में रहते हुए भी मैं उस अंधविश्वास के पिंजरे से खुद को निकाल नहीं पाई। वो इलाज नहीं, मजहब के नाम पर सरेआम डवैâती थी, मेरे जिस्म और मेरी रूह पर।’
इंसाफ की शुरुआत
मीडिया रिपोर्ट सामने आते ही स्कॉटलैंड यार्ड (लंदन पुलिस) हरकत में आई। जब कानून का शिकंजा कसा, तो मौलाना का वो ‘नूरानी’ नकाब उतर गया। धार्मिक पद और लोगों के भरोसे की आड़ में छिपा एक भेड़िया सलाखों के पीछे पहुंच चुका था।
आज ‘जाया’ थेरेपी ले रही है। वो रातों को चौंककर उठ जाती है, लेकिन अब वो कमजोर नहीं है। ‘मैं आज इसलिए बोल रही हूं ताकि पूर्वी लंदन या दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाली कोई और लड़की किसी नकली ‘रूहानी इलाज’ की बलि न चढ़े। मां-बाप को समझना होगा कि अंधविश्वास और आस्था में एक बारीक लकीर होती है।’ मस्जिद का जो लाउडस्पीकर कभी सुकून की अजान देता था, उसके पीछे छिपे एक शख्स ने कई मासूम जिंदगियों को कभी न भरने वाले जख्म दे दिए थे। सच तो ये है कि कोई साया उतना बुरा नहीं था जितना मजहब की आड़ में वो हैवान मौलाना था।
