मुख्यपृष्ठस्तंभमुलाकात : `मेरे फेफड़े कट रहे हैं..!'...कौन सुनेगा मुंबई की चीख?

मुलाकात : `मेरे फेफड़े कट रहे हैं..!’…कौन सुनेगा मुंबई की चीख?

-चमकती इमारतों के साए में सिसकते शहर की कहानी

मनमोहन सिंह

अरे…कौन हो तुम इतनी रात..? तुम्हें तो अपने घर होना चाहिए, घर तो है न तुम्हारे पास? क्योंकि मुझे वरदान है, जो भी मेरे पास आता है वह बेघर नहीं रहता और न ही भूखा…
मैं वह महानगर हूं, जिसे कभी `सपनों का शहर’ कहा गया तो कभी `सात द्वीपों की रानी।’ मेरी गोद में आकर न जाने कितने ही लोगों ने अपनी तकदीर संवारी। लेकिन आज, मैं अपनी भव्य इमारतों और जगमगाती रोशनी के पीछे छिपी अपनी एक गहरी पीड़ा को व्यक्त कर रही हूं। पिछले कुछ दशकों में मेरी त्वचा पर कंक्रीट के नहीं, बल्कि प्लास्टिक और लोहे की चादरों के घाव उभर आए हैं। जिसे आप `स्लम…झोपड़पट्टी’ या अतिक्रमण कहते हैं, वह असल में मेरी सांसों पर बढ़ता हुआ बोझ है। हालिया आंकड़ों ने मेरी चिंता और बढ़ा दी है। साल २०११ से २०२५ के बीच, मेरे शरीर पर हुए इन अवैध कब्जों के क्षेत्रफल में ६८ प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई है। मेरी २४ फीसदी जमीन पर अब झोपड़पट्टी का साम्राज्य है, जहां मेरी आधी से ज्यादा आबादी बसती है। मैं पूछती हूं, क्या यही मेरा भविष्य है? मेरी शिकायत केवल उन लोगों से नहीं है, जो मजबूरी में यहां बसे हैं। आखिर वे भी तो `मुंबईकर’ ही हैं। वे सुबह उठकर मेरे कारखानों को चलाते हैं, मेरे घरों में काम करते हैं और मेरी अर्थव्यवस्था का पहिया घुमाते हैं। मेरा दर्द है कि उनकी मजबूरी के बावजूद मैंने उन्हें सिर छिपाने के लिए एक सम्मानजनक छत नहीं दी। लेकिन मेरी असली शिकायत उस भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही से है, जिसने इस स्थिति को बेकाबू होने दिया।
`मैं अब थक चुकी हूं’
मेरे फेफड़े कहे जाने वाले मैंग्रोव्ज आज खतरे में हैं। कफ परेड से लेकर मालवणी और देवनार तक, माफियाओं ने मेरी तटीय हरियाली को काटकर वहां अवैध निर्माणों का जाल बिछा दिया है। कफ परेड में ८,००० वर्ग मीटर से ज्यादा मैंग्रोव्ज उजाड़ दिए गए। देवनार में तो नालों तक को नहीं बख्शा गया। प्रशासन बार-बार `कट-ऑफ’ की तारीखें बदलता रहा। पहले १९९५, फिर २००० और फिर २०११। इन तारीखों के खेल ने भू-माफियाओं के हौसले बढ़ाए और एक विशाल स्लम में बदल दिया। कंक्रीट जंगल तू मेरी नियति ही है! उन १र्०े१० दड़बेनुमा घरों में में रहने वाले मेरे बच्चों की हालत देखकर मेरा दिल रोता है। जहां न सूरज की रोशनी पहुंचती है, न साफ पानी।
मेरे फेफड़े कट रहे हैं, मैंग्रोव्स की चीख कौन सुनेगा?

जहां बिजली के तारों का जाल मौत को दावत देता है और शौचालयों की कमी एक अमानवीय वातावरण पैदा करती है। क्या एक आधुनिक शहर में इंसानी जिंदगी की कीमत इतनी कम है? अब सरकार कहती है कि वे `नेत्रम’ जैसी उपग्रह तकनीक से मुझ पर नजर रखेंगे। हर चार महीने में आसमान से मेरी तस्वीरें ली जाएंगी, ताकि नए अतिक्रमण को रोका जा सके। यह सुनकर थोड़ी उम्मीद तो जगती है, लेकिन सवाल वही है कि क्या तकनीक उन राजनेताओं और अधिकारियों की नीयत बदल पाएगी जो इन बस्तियों को केवल अपना `वोट बैंक’ समझते हैं? आखिर जिम्मेदारी तो इन्हीं लोगों की है न?
`मुफ्त घर नहीं, सम्मान की छत चाहिए’
विशेषज्ञ कहते हैं कि मुझे `मुफ्त घरों’ की नहीं, बल्कि `किफायती रेंटल हाउसिंग’ और बेहतर शहरी नियोजन की जरूरत है। मुझे सिंगापुर जैसा बनने का सपना दिखाया गया था, जिसने १० साल में खुद को झोपड़पट्टी-मुक्त कर लिया था। और मैं? मैं आज भी अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रही हूं। एशिया का सबसे बड़ा स्लम धारावी का टैग अभी तक मेरे माथे से हटा नहीं है…! मैं…मैं थक चुकी हूं इन बढ़ते बोझ से। मैं चाहती हूं कि मेरे हर निवासी यानी मुंबईकर को एक सम्मानजनक घर मिले, मेरे मैंग्रोव्ज सुरक्षित रहें और मेरी जमीन भू-माफियाओं के चंगुल से आजाद हो। क्या कोई सच में मुझे इस नरक से बाहर निकालेगा, या फिर `झोपड़पट्टी-मुक्त’ का नारा सिर्फ एक और चुनावी वादा बनकर रह जाएगा?
अरे लो… भोर का उजियारा हो गया है… अरे तुम्हारी आंखों में आंसू है! तुम उदास मत हो… अच्छा लगा कई दिनों के बाद किसी के साथ मैंने अपना मन हल्का किया… मुझे अभी भी आशा है कि सब ठीक हो जाएगा… मेरी कहानी तो साथ छोटे-छोटे टापुओं से शुरू हुई थी… आज मैं हिंदुस्तान की आर्थिक राजधानी हूं… दुनियाभर में लोग मुझे जानते हैं… लेकिन झोपड़पट्टी को देखकर दर्द महसूस होता है… यह दर्द उस वक्त नहीं था… जब गांव गांव थे खड़िया थी और छोटे-मोटे कच्चे मकान किसानों और मछुआरों के थे..!

(कल रात शहर में घूमता रहा परेशान, मुझे याद नहीं कि मेरे कदम मुझे किस ओर ले जा रहे थे, कदम थमे तो समंदर का वो किनारा था जो खाड़ी कहलाता है, दलदल के किनारे बैठा तो किसी की आवाज सुनाई दी…खामोशी से मैं सुनता चला गया… सुबह की लालिमा के साथ मुझे पता चला आवाज मेरी मुंबई की थी और वह मुझे गौर से निहार भी रही थी)

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