हेमलता त्रिपाठी
“शब्दों में भाव रखना/ अंधेरे में दीप जलाने जैसा है। दूसरों की आवाज पढ़कर/ मैंने अपनी धुन पाई। शायद ये शब्द तुम्हारे लिए भी/ लेप बन जाएं/ या एक सेतु/ तुम्हारी राह का, या कभी किसी अजनबी दिल से/ मिलाप का साधन। मित्र बनकर, परिवारजन बनकर, चिकित्सक बनकर, पड़ोसी बनकर, या फिर यूं ही इंसानों की भीड़ में/ एक साधारण सह साथी बनकर।” यह पंक्तियां हैं कवियत्री संगीता शुक्ला की जो उनके हिंदी में पहले काव्य संग्रह ‘समयचक्र’ की प्रथम कविता ‘शब्द उपचार’ शीर्षक से है। इस कविता से कवियत्री की रचनात्मक प्रतिभा का अंदाजा लगाया जा सकता है। संगीता शुक्ला का जन्म तो भारत में हुआ लेकिन वे पली बढ़ी और अब निवासी स्कैंडिनेवियन देश नार्वे की राजधानी ओस्लो की हैं। तीन विषयों में पोस्ट ग्रेजुएट संगीता यूनिवर्सिटी में पाठ्यक्रम विकासक एवं अकादमिक मार्गदर्शक तथा संस्कृति, बाल विकास और समाज से जुड़े विभिन्न परियोजनाओं में सक्रिय भाग लेती हैं।
संगीता शुक्ला कहती हैं कि “समय चक्र घेरता है और मैं उसके प्रतिबिंब लिखती हूं। हर पंक्ति में कोई स्वर बोल उठता है, जैसे समय मुझसे मेरा व अपना रहस्य कह रहा हो। शब्दों के बीच कहीं मैं स्वयं को पहचानने लगती हूं।”
संगीता शुक्ला का ‘समयचक्र’ लेखन के माध्यम से स्वयं की पहचान है। इसे प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग भारत ने प्रकाशित किया है इसकी पृष्ठ संख्या 78 है और मूल्य 270 रुपए है। इसमें तीन खंडों में कल 35 कविताएं संकलित हैं। पहला भाग ‘समयव्यूह’ है, यह भाग नार्वे में अल्पसंख्यक पृष्ठभूमि के साथ बड़े होने की यात्रा है। पहचान, पीढ़ियों और अपनेपन की खोज की कहानी है। इसके तहत शब्द उपचार, समय- दर्पण घड़ी व समय, अजनबी मिट्टी का पौधा, मैं कब नार्वे वाला बनूंगा यार, गंगा से ग्लोमा तक और आगे… तुम क्या हो तथा चंद लम्हों की शायरा कविताएं हैं। दूसरा भाग ‘चक्रव्यूह’ है। यह भाग व्यक्तिगत और सामूहिक पीड़ा के विभिन्न रूपों को छूता है। टूटन, धोखे और उन घावों को जिनसे हम सीखते हैं और कभी-कभी फिर से खुद को जोड़ने की कोशिश करते हैं। इस खंड में तू है सूर्य, प्रेम मरता है, सर्प कुंडली मारे बैठा है, अदृश्य रोग, पिंजर, तू आज भी है तथा मुस्तकबिले रोशन कविताएं हैं। भाग तीन ‘वज्रव्यूह’ आत्म खोज की यात्रा है। पहचान की खोज और आत्म स्वीकार की यात्रा का दर्पण, संपूर्णता की खोज की। जहां शब्द सिर्फ भाषा नहीं बल्कि मरहम बन जाते हैं।
वज्रव्यूह खंड में ममता, वृक्ष एक जीवन गाथा, अपमान का परिणाम, रिश्तो की बेड़ियां, एक मुस्कान के पीछे, सीमा का शुल्क, एक तोहफा, आत्मविश्वास, रूपांतरण- रूप और रूह की उड़ान, श्वास, साधना से क्या प्राप्त हुआ, नृत्य, शुक्रगुजारी, मैं एक प्राचीन आत्मा हूं, आओ सखी अब मोरे संग चलो तथा अब तक का सफर कविताएं हैं।
‘समयचक्र’ की कविताएं अद्भुत है। ‘प्रेम मरता है’ शीर्षक की कविता देखिए- प्रेम मरता है/ हर कठोर शब्द पर, हर उपेक्षा भरी नजर, हर अपमानजनक व्यवहार पर, हर बार जब हदें पार की जाती हैं। हर बार जब तुम मुझ पर हावी हो जाते हो, हर बार जो मेरे तन व आत्मा पर लगता है, हर बार जब मेरे बदन और रूह को रौंद देते हो, मेरा एक भाग मर जाता है। हर बार। एक भाग प्रेम का/ धीरे-धीरे/ टूट कर/ गिर जाता है। अंत में प्रेम का नामो निशान नहीं रहता।
पुस्तक की कविताओं में हिंदी और उर्दू के के साथ पंजाबी के शब्द मिलते हैं। एक कविता में आधुनिक मौखिक शैली और स्थानीय सलैंग का प्रयोग है। पुस्तक की सभी कविताओं के विषय जीवन व समाज से जुड़े हुए हैं। भाषा एकदम सरल, सहज व सुगम है। और यह पाठकों के दिल को छू जाती है। जिन पाठकों को गंभीर कविताओं से लगाव है। उन्हें संगीता शुक्ला की काव्य कृति “समयचक्र” अवश्य पसंद आएगी। आखिर में उल्लेखनीय है कि संगीता शुक्ला सुप्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय कवि व साहित्यकार सुरेशचंद्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ की सुपुत्री हैं।
