मुख्यपृष्ठस्तंभरिपोर्टर डायरी : बर्फ का खेल, बीमारी का मेल

रिपोर्टर डायरी : बर्फ का खेल, बीमारी का मेल

सुनील ओसवाल

दोपहर की तपती धूप जब शहर की सड़कों को तवे की तरह झुलसा देती है, तब इंसान सबसे पहले राहत की तलाश करता है। सूखता गला, चकराता सिर और बढ़ती बेचैनी के बीच एक गिलास ठंडा पानी या बर्फ मिला पेय किसी वरदान से कम नहीं लगता। लेकिन यही राहत अब एक छुपे खतरे में बदलती दिखाई दे रही है। जो बर्फ शरीर को ठंडक देनी चाहिए, वही अगर बीमारी की वजह बन जाए, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि एक गंभीर सिस्टम फेलियर है।
रिपोर्टिंग के दौरान बार-बार एक जैसी तस्वीर सामने आती है, खुले में रखी बर्फ की सिल्लियां, गंदे बोरे, अस्वच्छ पानी और बिना किसी सुरक्षा के उसे तोड़ते-ढोते मजदूर। कई जगहों पर बर्फ सीधे जमीन पर रखी होती है, जिसे फिर ठेलों और दुकानों तक पहुंचाया जाता है। यह देखना मुश्किल नहीं कि इस बर्फ की ‘साफ-सफाई’ सिर्फ दिखावे तक सीमित है। चिंता की बात यह है कि यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि आम चलन बन चुका है। सस्ते उत्पादन के लिए संदिग्ध पानी का इस्तेमाल, बिना फिल्टर या जांच के बर्फ बनाना और फिर उसे खुले वातावरण में रखना, यह पूरी प्रक्रिया ही जोखिम से भरी है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हम ठंडक के नाम पर अपने शरीर को बीमारियों के हवाले कर रहे हैं? डॉक्टरों के अनुसार, दूषित बर्फ से पेट के संक्रमण, उल्टी-दस्त, टायफाइड और यहां तक कि गंभीर बैक्टीरियल बीमारियां भी पैâल सकती हैं। लेकिन समस्या यह है कि जब बीमारी सामने आती है, तब तक उसके स्रोत पर कोई ध्यान नहीं देता। लोग दवा लेते हैं, लेकिन कारण वही बना रहता है। इस पूरे मामले में प्रशासनिक निगरानी सबसे कमजोर कड़ी नजर आती है। नियम और गाइडलाइन कागजों पर सख्त जरूर हैं, लेकिन जमीन पर उनका असर बेहद कमजोर है। निरीक्षण कभी-कभार होता है और कार्रवाई अक्सर तब होती है जब मामला सुर्खियों में आता है। तब तक यह ‘बर्फ का खेल’ बेरोकटोक चलता रहता है। दूसरी तरफ उपभोक्ता भी अनजाने में इस समस्या को बढ़ा रहे हैं। सड़क किनारे मिलने वाले सस्ते ठंडे पेय और बर्फीले शरबत तुरंत राहत देते हैं, लेकिन उनकी गुणवत्ता पर शायद ही कोई सवाल उठाता है। कीमत और सुविधा के आगे स्वास्थ्य अक्सर पीछे छूट जाता है। असल में यह समस्या तीन स्तरों पर पैâली है, लाभ के लिए समझौता करता व्यवसाय, ढीली पड़ती प्रशासनिक व्यवस्था और जागरूकता की कमी से जूझता उपभोक्ता। जब ये तीनों एक साथ आते हैं, तो नतीजा वही होता है जो आज दिख रहा है।
समाधान साफ है, लेकिन अमल जरूरी है। बर्फ उत्पादन इकाइयों की सख्त जांच, स्वच्छ पानी का अनिवार्य उपयोग, नियमित सैंपल टेस्टिंग और नियम तोड़ने वालों पर त्वरित कार्रवाई ये कदम अब टाले नहीं जा सकते। साथ ही, लोगों में जागरूकता बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है। रिपोर्टर डायरी का यह पन्ना एक चेतावनी है, ठंडक की तलाश में कहीं हम बीमारी को तो नहीं बुला रहे? अगर राहत ही जोखिम बन जाए, तो यह केवल एक लापरवाही नहीं, बल्कि एक खामोश खतरा है, जो हर गिलास के साथ हमारे भीतर उतर रहा है।

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