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पालने में विराजती हैं मां अलोप शंकरी : नवरात्रि के पहले दिन उमड़े दुर्गा भक्त

-नौ दिनों तक देवी आराधना से गुंजायमान रहेगी संगमनगरी, मां शैलपुत्री की पूजा के साथ शारदीय नवरात्र का शुभारंभ

राजेश सरकार / प्रयागराज

संगमनगरी प्रयागराज में रविवार, 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र का शुभारंभ होते ही वातावरण भक्तिमय हो उठा। मां दुर्गा के जयकारों, घंटा-घड़ियालों की गूंज और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था के बीच देवी मंदिरों में दर्शन-पूजन का सिलसिला शुरू हो गया। नवरात्र के प्रथम दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। घरों में कलश स्थापना के साथ नौ दिवसीय शक्ति उपासना का संकल्प लिया गया। इस पावन पर्व पर अलोपीबाग स्थित मां अलोप शंकरी सिद्धपीठ में भी श्रद्धालुओं ने माता के दरबार में शीश नवाकर सुख, शांति, समृद्धि और परिवार की मंगलकामना की।
अद्भुत है मां अलोप शंकरी की महिमा
नौ दुर्गा शक्ति पीठों में एक प्रयागराज के मां अलोप शंकरी मंदिर अपनी अनूठी परंपरा और धार्मिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। यहां अन्य देवी मंदिरों की तरह मां की पारंपरिक प्रतिमा के दर्शन नहीं होते, बल्कि गर्भगृह में विराजमान पवित्र पालने की पूजा-अर्चना की जाती है। यही विशेषता इस सिद्धपीठ को विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता सती के शरीर का एक अंग यहां गिरकर विलीन हो गया था। इसी मान्यता के चलते देवी का नाम ‘अलोप शंकरी’ पड़ा। श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि मां के प्रति समर्पण, विश्वास और आध्यात्मिक अनुभूति का प्रतीक है।
पहले दिन मां शैलपुत्री की आराधना
नवरात्र के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा का विशेष महत्व है। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण माता को शैलपुत्री कहा जाता है। उन्हें शक्ति, धैर्य, दृढ़ संकल्प और शुभारंभ का प्रतीक माना जाता है। भक्त विधि-विधान से पूजन कर अपने जीवन में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा की कामना करते हैं।
परंपरा के अनुसार, नवरात्र के पहले दिन घरों में कलश स्थापना की जाती है। इसके साथ दुर्गा सप्तशती का पाठ, मंत्र-जाप, आरती और भजन-कीर्तन आरंभ होते हैं। श्रद्धालु नौ दिनों तक व्रत रखकर मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना करते हैं।
आस्था के साथ सेवा और सद्भाव का संदेश
नवरात्र का पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह नारी शक्ति के सम्मान, आत्मसंयम, सेवा, करुणा और सामाजिक सद्भाव का संदेश भी देता है। मां के दरबार में पहुंचने वाले श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं और पूजा-अर्चना के माध्यम से मानसिक शांति तथा आत्मबल प्राप्त करने की कामना करते हैं।
संगम, मंदिरों और धार्मिक परंपराओं के लिए विख्यात प्रयागराज में नवरात्र का विशेष सांस्कृतिक महत्व है। मां अलोप शंकरी सिद्धपीठ सहित प्रमुख देवी मंदिरों में नौ दिनों तक श्रद्धा और भक्ति का वातावरण बना रहेगा। मां के जयकारों के बीच श्रद्धालु शक्ति की आराधना कर मंगलमय जीवन की कामना कर रहे हैं।
सिद्धपीठ की विशेषता
शहर के अलोपीबाग मोहल्ले में स्थित अलोप शंकरी मंदिर की विशेष पहचान में मंदिर के गर्भगृह में देवी की पारंपरिक प्रतिमा के स्थान पर पवित्र पालने की पूजा होती है। मान्यता है कि यहां माता सती का एक अंग विलीन हो गया था, इसलिए देवी को अलोप शंकरी कहा जाता है।
नवरात्रि का महत्व: नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। प्रथम दिन की पूजा मां शैलपुत्री की आराधना, कलश स्थापना और दुर्गा उपासना से शुभारंभ होता है। सुख-शांति, समृद्धि, परिवार की खुशहाली और जीवन में शक्ति एवं सकारात्मकता की प्रार्थना और मनोकामना भक्तों द्वारा की जाती है।

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