मुख्यपृष्ठनए समाचारमुंबई प्रदूषण में अव्वल सरकारी रिपोर्ट में हवा ‘संतोषजनक’!

मुंबई प्रदूषण में अव्वल सरकारी रिपोर्ट में हवा ‘संतोषजनक’!

-प्रदूषण के दो पैमानों ने बढ़ाया भ्रम
-१५ अक्टूबर को निजी निगरानी में
देश का सबसे प्रदूषित शहर मुंबई
सामना संवाददाता / मुंबई
मुंबई की हवा आखिर कितनी प्रदूषित है? इस सवाल पर सरकारी और निजी निगरानी संस्थाओं के आंकड़े अलग-अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं। १५ अक्टूबर को निजी संस्था आईक्यूएयर ने मुंबई को भारत का सबसे प्रदूषित और दुनिया के १२२ शहरों में पांचवां सबसे प्रदूषित शहर बताया। दूसरी ओर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यानी सीपीसीबी ने उसी दिन शहर की वायु गुणवत्ता को ‘संतोषजनक’ श्रेणी में रखा।
अक्टूबर के पहले २३ दिनों में सीपीसीबी के अनुसार, ११ दिनों में हवा खराब श्रेणी में थी, जबकि आईक्यूएयर ने सभी २३ दिनों में अस्वास्थ्यकर परिस्थितियां दर्ज कीं। आईक्यूएयर का अधिकतम वायु गुणवत्ता सूचकांक १७ अक्टूबर को १८८ रहा, जबकि सीपीसीबी ने १८ अक्टूबर को अधिकतम १२७ दर्ज किया। हालांकि दोनों संस्थाओं के सूचकांक की गणना, निगरानी केंद्र और श्रेणी निर्धारण के तरीके अलग हैं। इसलिए इन आंकड़ों को सीधे समान पैमाने पर रखकर किसी संस्था को गलत घोषित करना उचित नहीं होगा। फिर भी विरोधाभास नागरिकों के लिए चिंता का विषय है। जब मुंबईकर एक ही हवा में सांस ले रहे हैं, तो प्रदूषण की चेतावनी देने वाली प्रणालियों के बीच इतना अंतर क्यों है?
मुंबई में प्रदूषण मीटर का कमाल; बाहर धूल का बवाल, स्क्रीन पर प्रदूषण शून्य!
महानगर में निर्माण कार्यों से फैलने वाले प्रदूषण की निगरानी के लिए लगाए गए डिजिटल बोर्डों की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में आ गई है। पर्यावरण कार्यकर्ता सुमैरा अब्दुलअली की पड़ताल में कुछ निर्माण स्थलों के प्रदूषण बोर्डों पर शून्य रीडिंग दिखाई दी, जबकि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के समीर ऐप में संबंधित क्षेत्र में पीएम २.५ और पीएम १० कणों की मौजूदगी दर्ज थी। मुंबई में लगभग ३,२०० निर्माण स्थल हैं। इनमें करीब ३,१६६ स्थलों के प्रदूषण सेंसर बीएमसी के केंद्रीय डैशबोर्ड से जुड़े बताए गए हैं। निर्माण स्थलों पर लगे सेंसरों का उद्देश्य धूल और प्रदूषण की निगरानी करना है, ताकि नियमों का उल्लंघन होने पर कार्रवाई की जा सके, लेकिन यदि उपकरण गलत रीडिंग दिखाते हैं तो निगरानी व्यवस्था का उद्देश्य ही प्रभावित हो सकता है।
मनपा ने तीसरे पक्ष से जांच कराने की बात कही
नगर निगम ने निगरानी व्यवस्था की स्वतंत्र जांच कराने और संदिग्ध रीडिंग वाले स्थानों का निरीक्षण करने की योजना बताई है। हालांकि किसी निर्माण स्थल की स्थानीय रीडिंग और दूसरे स्थान के समीर ऐप के आंकड़ों में अंतर होना अपने आप में सेंसर खराब होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। दोनों स्थानों की दूरी, समय, उपकरणों का रखरखाव और मापन पद्धति भी जांचनी होगी। बीएमसी को सेंसरों की जांच रिपोर्ट और नियम उल्लंघन पर की गई कार्रवाई सार्वजनिक करनी चाहिए। प्रदूषण रोकने के लिए लगाए गए मीटर ही भरोसेमंद नहीं होंगे, तो मुंबई की हवा सुधारने के दावों की जांच वैâसे होगी?

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