सूफी खान
मिडिल ईस्ट या वेस्ट एशिया में बने तनाव और जंग के हालात के बीच एक ऐसी घटना हो रही है, जो इस वक्त अजीब लगती है, लेकिन पहले से लिखी स्क्रिप्ट का हिस्सा भी है। दरअसल, ३० सितंबर को इराक में अमेरिका का आखिरी दिन था। अब ईरान का खौफ कह लें या समझौते की पासदारी, ३० सितंबर २०२६ से अमेरिका इराक से पूरी तरह हट चुका होगा। जी हां, अमेरिका की इराक से घर वापसी हो गई है, वो भी ऐसे वक्त में जब इराक के पड़ोसी ईरान के साथ उसका तनाव बरकरार है। अमेरिका ने साल २००३ में इराक पर हमला किया था और उस वक्त इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को हटाकर अपने हिसाब की सरकार बनाई। २०११ में अमेरिकी सेना वहां से हट गई थी, लेकिन जिस तरह आईएसआईएस यानी दाइश, जो एक खूंखार दहशतगर्द तंजीम है, उसके नेता अबू बकर अल-बगदादी और उसके दहशतगर्दों ने इराक में कत्लेआम मचाया और बगदाद, करबला समेत दूसरे इलाकों पर कब्जा करने निकल पड़े, तब इराक के शिया लड़ाकों ने पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्स बनाकर इन्हें खदेड़ा। यहां फिर से अमेरिका को इराक में वापसी का बहाना मिल गया और उसने दोबारा इराक में डेरा जमा लिया। हालांकि, इराक में दो दशकों तक चली लड़ाई में अमेरिका को अफगानिस्तान की तुलना में अपने दोगुने सैनिकों की जान गंवानी पड़ी है। इराक में इन दो दशकों के दौरान ईरान का खासा प्रभाव हो गया है। हालांकि, इराक में शिया नेतृत्व वाली अमेरिकापरस्त सरकार है, लेकिन फिर भी ईरान की चलती है। इसकी वजह है इराक में मौजूद ईरान समर्थित रजिस्टेंस, जिसकी वहां खासी पकड़ है। ऐसे में अमेरिका की इराक से वापसी को ईरान और उसके सहयोगी अपनी जीत के तौर पर मना रहे हैं। एक्सपर्ट कहते हैं कि इराक से अमेरिका की वापसी के बाद ईरान का रजिस्टेंस यहां मजबूत होगा, लेकिन हो सकता है कि सीरिया में नई सरकार आने के बाद जिस तरह से हालात बदले हैं, उससे आईएसआईएस फिर सक्रिय हो जाए और इराक में बने खालीपन का फायदा उठाने की कोशिश करे। अब देखना होगा कि क्या ईरान इराक से अमेरिका की वापसी को अपनी जीत के तौर पर पेश करता है, क्योंकि जंग के हालात के बीच अमेरिका का एक बड़े मोर्चे से हटना अमेरिका की खित्ते में बड़ी हार के तौर पर देखा जाएगा। यह भी देखना होगा कि राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल में हुए इस समझौते के तहत क्या इराक से अमेरिका की फौजें पूरी तरह हट भी रही हैं या नहीं।
