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मुस्लिम वर्ल्ड : एर्दोगान का डर या वजह कुछ और… डील साइन करने क्यों नहीं पहुंचे नेतन्याहू?

सूफी खान

गाजा में युद्ध खत्म करने पर मुहर लगाने के लिए अमेरिका समेत कई देशों के प्रतिनिधि मिस्र के शर्म अल-शेख में जुटे। हालांकि, इसमें इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के शामिल होने की संभावना भी जताई गई थी, लेकिन उन्होंने इस सम्मेलन से कुछ समय पहले ही इसमें शामिल होने से साफ तौर पर इनकार कर दिया। पश्चिमी मीडिया से जो रिपोर्ट आई उसके मुताबिक, ट्रंप के अंतिम समय पर निमंत्रण देने पर नेतन्याहू इस सम्मेलन में शामिल होनेवाले थे, लेकिन तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैय्यब एर्दोगान की तरफ से डाले गए कूटनीतिक दबाव की वजह से उनका मिस्र आना संभव नहीं हो पाया।
मीडिया रिपोर्ट में तुर्की के एक राजदूत के हवाले से बताया गया कि एर्दोगान ने मिस्र में नेतन्याहू की उपस्थिति का विरोध किया और बाकी देशों के नेताओं से भी इस बारे में बात की। सूत्र बताते हैं कि रजब तैय्यब एर्दोगन की पहल और तुर्की के राजनयिक प्रयासों से अन्य नेताओं से संपर्क साधा गया। इसके बाद उन नेताओं के समर्थन की वजह से उपजे दबाव के कारण नेतन्याहू मिस्र की बैठक में शामिल नहीं हुए।
तुर्की की मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, गाजा पीस समिट में शामिल होने के लिए मिस्र जानेवाले एर्दोगन ने तब तक वहां उतरने से इनकार कर दिया था। जब तक कि उन्हें आश्वासन नहीं मिल गया कि नेतन्याहू यहां नहीं आ रहे हैं। कथित तौर पर, जब तक उनके सामने इस बात की पुष्टि नहीं हो गई, तब तक उनका विमान आसमान में ही चक्कर लगाता रहा था।
इधर इजरायली प्रधानमंत्री कार्यालय ने नेतन्याहू के मिस्र न जाने के पीछे यहूदी त्योहार सिमहत को वजह बताया है। यह त्योहार सोमवार को सूर्यास्त के समय शुरू हुआ था। हालांकि, राजनयिक सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो अन्य देशों के बढ़ते विरोध के बाद ही पीएम नेतन्याहू ने कार्यक्रम से पीछे हटने का फैसला लिया।
गाजा में युद्ध अपराधों के आरोपों के चलते नेतन्याहू के खिलाफ इंटरनेशनल कोर्ट की तरफ से गिरफ्तारी वारंट निकाला गया है। हालांकि, मिस्र इंटरनेशनल कोर्ट में समझौते का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, लेकिन इसके बाद वहां मौजूद दूसरे अरब नेता इस पर आपत्ति जता सकते थे। दूसरी तरफ इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू की उपस्थिति और वहां पर फिर अरब नेताओं के साथ उनकी तस्वीरें वायरल होने की स्थिति में घरेलू स्तर पर उनकी राजनीति भी प्रभावित हो सकती थी। एर्दोगान शुरुआत से ही इजरायल के आलोचक खुद को दिखाते रहे हैं और कतर पर हाल ही में हुए हमले के बाद तो उन्होंने इजरायल पर लगातार जबानी हमले जारी रखे हैं। लेकिन आरोप ये भी लगता है कि तुर्की इजरायल के साथ कारोबार करता है और अजरबैजान का कच्चा तेल तुर्की के रास्ते ही इजरायल तक पहुंचता है।

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