-निर्यात ठप, उत्पादन गिरा, मजदूरों का पलायन
-गंभीर मुश्किल में टेक्सटाइल सिटी
सुनील ओसवाल / मुंबई
देश को ‘टेक्सटाइल वैâपिटल’ का दर्जा दिलाने वाले सूरत के कपड़ा उद्योग पर पिछले ६० दिनों में ऐसा आर्थिक संकट टूटा कि करीब ३,००० करोड़ रुपए का कारोबार स्वाहा हो गया। निर्यात ठप पड़ा, उत्पादन आधा रह गया, हजारों मजदूर गांव लौट गए और बाजारों में सन्नाटा छा गया। लेकिन उद्योग जगत का आरोप है कि संकट के दौरान न दिल्ली जागी, न गांधीनगर।
असल में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव और समुद्री व्यापार मार्गों पर पैदा हुए संकट का सबसे बड़ा शिकार सूरत बना। रोजाना ५० से ६० करोड़ रुपए के कारोबार का नुकसान हुआ, लेकिन उद्योग को राहत देने के लिए न कोई विशेष पैकेज आया, न मालभाड़ा सब्सिडी और न ही एमएसएमई इकाइयों के लिए कोई आपात सहायता। सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि सूरत सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि गुजरात मॉडल की आर्थिक पहचान माना जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा वर्षों से गुजरात की औद्योगिक सफलता को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताते रहे हैं। मगर जब सूरत का सबसे बड़ा उद्योग संकट में फंसा, तब सरकार की सक्रियता दिखाई नहीं दी। कपड़ा बाजारों में कारोबार घटा तो पैâक्ट्रियों ने शिफ्टें कम कर दीं। कच्चे माल की कीमतें बढ़ीं, गैस महंगी हुई, पैकेजिंग लागत आसमान छूने लगी। दूसरी तरफ जहाजों के रूट बदलने से मालभाड़ा कई गुना बढ़ गया। छोटे और मध्यम उद्योगों की पूंजी कंटेनरों और बंदरगाहों में फंसकर रह गई।
३,००० करोड़ का दर्द
६० दिन में ३,००० करोड़ रुपए का नुकसान
रोजाना ५०-६० करोड़ रुपए का कारोबार घटा
उत्पादन में ५० फीसदी तक गिरावट
३५ फीसदी तक मजदूरों का पलायन
शिपिंग लागत में ४०० फीसदी तक उछाल
पैकेजिंग सामग्री ३०-४० फीसदी महंगी
