मनमोहन सिंह
हमारे दफ्तर में एक ‘कैफेटेरिया’ भी है… शानदार।
बंबू एंड ग्लास टॉप टेबल्स और आरामदेह मोनोब्लॉक चेयर्स एक कोने में माइक्रोवेव ओवन!
साफ-सफाई गजब की! अचानक एक कॉकरोच सामने आ गया। अखबार फोल्ड किया और और उसे मारने ही जा रहा था कि वह जोर से चिल्लाया ‘रुको यार… तुम तो अपनी सरकार जैसे हो गए!’
यार! मैं कब का यार? और सरकार भी? गजब की बेइज्जती! गुस्सा तो आया फिर सोचा बात कर लेने में क्या बुराई है!
‘बको…’ मैं गुर्राया
‘जिस तरह से तुम मुझे मारने आए और जिस अंदाज से ‘बको’ कहा ये सरकारी है’ उसने हंसते हुए कहा।
अब मैंने अदब से कहा ‘हुजूर फरमाइए…’
उसने ऐसे देखा मानो मैं गिरगिट हूं।
टेबल पर बैठा वह अदना-सा कॉकरोच अचानक आकार में बड़ा और मुद्रा में दार्शनिक लगने लगा था। मैंने गहरी सांस ली और कहा, ‘यार, बात तो तुम्हारी कड़वी है, पर सच्ची है। पर तुम हमारी व्यवस्था से अपनी तुलना मत ही करो’
कॉकरोच ने मूंछें हिलाईं, मानो हंस रहा हो। बोला, ‘यार, इंसानी हुक्मरानों और हममें बहुत समानताएं हैं। हम डायनासोर के जमाने से हैं, परमाणु हमले में भी नहीं मरते और तुम्हारी व्यवस्था के घोटाले और फाइलें भी। हां यह बात और है कि हम माइक्रोवेव में छिपे रहते हैं और तुम ओवन की तरह अंदर ही अंदर सुलगते हो।’
‘मैं अपनी नहीं, उस युवा की बात करूंगा जिसे व्यवस्था ने रेंगने पर मजबूर कर दिया है।’
उसने टेबल पर एक चक्कर काटा और कहना शुरू किया, ‘देखिए जनाब, चुनाव आते हैं, तो घोषणापत्रों की ऐसी ‘पेस्ट कंट्रोल’ दवा छिड़की जाती है मानो बेरोजगारी के सारे कॉकरोच हमेशा के लिए साफ हो जाएंगे। करोड़ों नौकरियों के वादे होते हैं। लेकिन हकीकत? युवा वर्षों तैयारी करता है, फॉर्म भरता है और ऐन वक्त पर पेपर लीक! ये पेपर लीक क्या है? तुम्हारे ऊपर छिड़का जाने वाला वह कीटनाशक, जो तुमको रेंगते रहने के लिए मजबूर करने के लिए बनाया गया है।’
मैंने टोका, ‘लेकिन सरकार तो कहती है कि युवा अयोग्य हैं, स्किल्ड नहीं हैं।’
‘धत तेरे की!’ ई त उहे बात भइल के ‘नाच न जाने आंगन टेढ़ा’। जब करोड़ों युवा डिग्री लेकर सड़कों पर दौड़ते हैं, तो उन्हें ‘भीड़’ कह देते हैं। और जब हक मांगते हैं, तो ज्ञान मिलता है, ‘पकोड़े तलो, वो भी रोजगार है।’ मतलब, युवाओं की औकात हम कॉकरोच जैसी है? जब मन किया ‘बको’ कहकर दुत्कार दिया? वो बोला।
मैं: (गहरी सांस लेकर) बात तो कड़वी है, पर युवा चुप भी तो हैं।
कॉकरोच: (हंसते हुए) ‘चुप? युवाओं ने अब लाठियां खाना छोड़ दिया है। अब उन्होंने डिजिटल दुनिया में हमारा ‘सहारा’ लिया है! अपनी फौज खड़ी कर ली है, ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ सोशल मीडिया के हैशटैग अब नई संसद हैं।
‘पर इससे बदलेगा क्या? मीम्स से सरकार को फर्क नहीं पड़ता’ मैंने ज्ञान झाड़ा।
कॉकरोच: (गंभीर होकर) यही तो भूल है तुम्हारी। लोकतंत्र में सबसे खतरनाक वक्त वह नहीं जब जनता पत्थर उठाती है; सबसे डरावना वक्त वह है जब पढ़ा-लिखा युवा व्यवस्था पर हंसने लगे, उसका मजाक उड़ाने लगे। गुस्सा शांत हो सकता है यार, लेकिन जब भरोसा टूटकर ‘व्यंग्य’ बन जाए, तो समझो बुनियाद हिल चुकी है। मतलब ‘आता माझी सटकली’ तो समझो खेल खत्म!’
इतना कहकर वह कॉकरोच धीरे से सरकते हुए ओवन के पीछे चला गया। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैंने अभी-अभी एक कॉकरोच का प्रवचन सुना था, या देश के करोड़ों युवाओं के भीतर दबा कड़वी हकीकत! वैâफेटेरिया के बंबू टेबल पर अखबार मेरे हाथ से छूटकर हंस रहा था।
