अरुण कुमार गुप्ता
बिहार की सियासत में विधान परिषद चुनाव ने एनडीए के भीतर की दरारों को खुलकर सामने ला दिया है। उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) में ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने पार्टी नेतृत्व के सामने बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया है। पार्टी के चार में से तीन विधायक माधव आनंद, रामेश्वर महतो और आलोक कुमार सिंह सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में एनडीए के आधिकारिक उम्मीदवार के बजाय अपनी ही पार्टी के नेता रामपुकार सिन्हा के साथ खड़े हो गए हैं। सारण शिक्षक सीट से एनडीए ने जेडीयू के आनंद पुष्कर को उम्मीदवार बनाया है। दूसरी ओर आरएलएम के प्रदेश महासचिव और प्रवक्ता रामपुकार सिन्हा ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर नामांकन दाखिल किया। यानी सवाल सीधा है जब आरएलएम एनडीए का हिस्सा है और पार्टी नेतृत्व एनडीए उम्मीदवार के साथ है, तो पार्टी के चार में से तीन विधायक अलग लाइन पर क्यों खड़े हैं? बागी तेवर दिखा रहे विधायकों का कहना है कि वे रामपुकार सिन्हा के समर्थन में पार्टी कार्यकर्ताओं के सम्मान और लंबे राजनीतिक योगदान को देखते हुए आए हैं।
एक सीट… ४० उम्मीदवार!
बिहार विधान परिषद चुनाव की तस्वीर सामने आते ही दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र सबसे ज्यादा चर्चा में आ गया है। एक सीट के लिए करीब ४० उम्मीदवारों का मैदान में उतरना चुनावी गणित से कहीं ज्यादा बड़ा सवाल खड़ा करता है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक एमएलसी सीट पर दावेदारों की इतनी बड़ी फौज खड़ी हो गई? स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का मतदाता वर्ग पढ़ा-लिखा माना जाता है। ऐसे में इतनी बड़ी संख्या में उम्मीदवारों का उतरना केवल टिकट पाने की होड़ नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीतिक महत्वाकांक्षा और प्रतिनिधित्व की मांग का संकेत भी माना जा सकता है। लेकिन चुनावी मैदान में दावेदारों की संख्या देखकर सवाल उठता है कि क्या इन मुद्दों पर गंभीर राजनीतिक बहस होगी या चुनाव व्यक्तिगत समीकरणों तक सीमित रह जाएगा? लोकतंत्र में ज्यादा उम्मीदवार होना अपने आप में कोई समस्या नहीं है। हर पात्र नागरिक को चुनाव लड़ने का अधिकार है। लेकिन ४० उम्मीदवारों वाली एक सीट यह सवाल जरूर खड़ा करती है कि क्या चुनावी व्यवस्था में मतदाता तक हर उम्मीदवार का एजेंडा और उसकी राजनीतिक जवाबदेही प्रभावी तरीके से पहुंच पाएगी?
-५० लाख रंगदारी, ३ज्ञ् कमीशन का खेल!
-चिराग के विधायक पर एफआईआर!
बिहार के सीवान में लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के विधायक विष्णुदेव पासवान पर लगे आरोपों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। आंदर थाने में ठेकेदार विवेक कुमार सिंह की शिकायत पर विधायक समेत अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। ठेकेदार ने आरोप लगाया है कि उससे ५० लाख रुपए की रंगदारी और निर्माण कार्य की राशि का ३ प्रतिशत कमीशन मांगा गया। पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है और दो आरोपियों की गिरफ्तारी की खबर है। शिकायत के मुताबिक, मामला आंदर में निर्माणाधीन सरकारी भवन से जुड़ा है। ठेकेदार का आरोप है कि निर्माण स्थल पर पहुंचकर उस पर काम रोकने का दबाव बनाया गया और ५० लाख रुपए की मांग की गई। इसके साथ ही निर्माण कार्य की राशि में ३ प्रतिशत कमीशन मांगे जाने का भी आरोप लगाया गया है। सवाल यह है कि अगर ये आरोप गलत हैं तो इतनी गंभीर शिकायत आखिर किन परिस्थितियों में सामने आई? और अगर आरोपों में सच्चाई है तो सरकारी निर्माण कार्य में कथित दबाव बनाने वालों के पीछे कौन था?
