मुख्यपृष्ठसंपादकीयसंपादकीय :  केजरीवाल, स्टालिन वगैरह क्या करेंगे?.. न्यायाधीश नरीमन की चिंता

संपादकीय :  केजरीवाल, स्टालिन वगैरह क्या करेंगे?.. न्यायाधीश नरीमन की चिंता

भ्रष्ट `ग्यॅनेश’ कुमार के खिलाफ तीन सौ के आस-पास सांसदों ने दिल्ली में आंदोलन किया। असंख्य सांसदों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने जो लोहे के बैरिकेड खड़े किए थे, उन्हें धकेलकर आंदोलनकारी सांसद आगे बढ़ गए। सांसद निर्वाचन सदन जाकर `ग्यॅनेश’ कुमार से मिलना चाहते थे और सरकार की पुलिस उन्हें रोक रही थी। राहुल गांधी और उनके लोगों ने आकाशवाणी भवन में `धरना’ दिया। वहीं पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। `एसआईआर’ के खिलाफ देश सुलग रहा है। राजधानी में तो दावानल भड़क उठा है। इस दावानल से `आप’ और `द्रमुक’ जैसे दल दूर रहे। `आप’ और कांग्रेस के बीच मतभेद हैं, लेकिन देश तानाशाह के हलक में है और उसे छुड़ाना चाहिए, इस बात पर तो `आप’ की सहमति होनी चाहिए। तमिलनाडु में द्रमुक की हार हुई। वहां सिनेमा स्टार विजय की टीवीके पार्टी सत्ता में आई। उस सरकार में कांग्रेस शामिल हुई, इसका गुस्सा रखकर द्रमुक अलग-थलग रवैया अपना रही है, लेकिन उनका यह रुख राष्ट्रहित के खिलाफ है। आम आदमी पार्टी के नेता केजरीवाल ने मोदी, शाह और चुनाव आयोग की मनमानी का कड़वा अनुभव लिया है। मुख्यमंत्री रहते हुए केजरीवाल को झूठे मामले में फंसाकर गिरफ्तार किया गया। उन्हें छह महीने जेल में डाला गया। दिल्ली के मतदाताओं के नाम काटकर `आम आदमी’ पार्टी को हराया गया। खुद केजरीवाल हार गए। इसलिए इंडिया ब्लॉक से दूर रहना उनके हित में नहीं है। पंजाब के विधानसभा चुनाव अहम मुद्दा हैं, यह मानने के बावजूद
मोदी-शाह के खिलाफ
इस लड़ाई में केजरीवाल को शामिल होना चाहिए। द्रमुक के एम. के. स्टालिन को भी तानाशाही विरोधी लड़ाई में उतरना चाहिए। ओडिशा में नवीन पटनायक की बीजू जनता दल के सांसद `ग्यॅनेश’ कुमार विरोधी आंदोलन में शामिल हुए, इसे समझदारी की बात मानना होगा। देश की जनता त्रस्त है। सरकार भ्रष्ट है। इसलिए त्रस्त जनता ने इस सरकार के खिलाफ बिगुल फूंक दिया है। उस आंदोलन का तूफान देशभर में उठ खड़ा हुआ है। बुधवार को दिल्ली की कड़कती धूप में ३०० सांसद गरजते हुए आगे बढ़े। राहुल गांधी लोहे के बैरिकेड पर चढ़कर तिरंगा फहराते दिखे, जिसे पूरे देश ने देखा। राहुल गांधी का धरना-प्रदर्शन जारी रहने के दौरान भाजपा के प्रवक्ताओं ने चार पत्रकार वार्ताएं कीं और राहुल गांधी के आंदोलन व मांगों को ढोंग बताया; हालांकि, उनके बोलने पर देश ने ध्यान नहीं दिया। आश्चर्य यह है कि अडानी और अंबानी के स्वामित्व वाले समाचार चैनल राहुल गांधी के उग्र आंदोलन का सीधा प्रसारण दिखा रहे थे। इसका मतलब हवा बदल रही है। मोदी-शाह सत्ता से जा रहे हैं, ऐसा विश्वास लोगों को हो रहा है। मोदी-शाह से अब कोई नहीं डरता। इसीलिए दिल्ली की सड़कों पर घमासान मचा है। `जंतर-मंतर’ पर मोदी-शाह ने ताला ठोक दिया है, फिर भी नेहा बोरा और उनके कार्यकर्ता रोज `जंतर-मंतर’ इलाके में आकर पुलिस से टकरा रहे हैं। मोदी-शाह की नींद उड़ाने वाली यह तस्वीर है। `ग्यॅनेश’ कुमार तो किसी
भगोड़े अपराधी की तरह
`अंडरग्राउंड’ हो गए हैं। चीफ इलेक्शन कमिश्नर संविधान का सुरक्षा कवच पहनकर कुर्सी पर बैठे हैं। उनके बारे में `ओवरप्रोटेक्टेड कॉन्स्टिट्यूशनल अथॉरिटी’ कहा जाता है। सुरक्षा की यह संवैधानिक दीवार भी जनसैलाब के आगे ढह जाएगी और उस दीवार के नीचे सभी घुट जाएंगे। सांसदों के आंदोलन से उस दीवार पर पहला हथौड़ा पड़ा है। अब इस दीवार को ढहने में देर नहीं लगेगी। भाजपा के प्रवक्ता पोपटलाल राहुल गांधी पर टिप्पणी कर रहे हैं। उन्हें सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश रोहिंटन नरीमन की बात पर ध्यान देना चाहिए। न्यायाधीश नरीमन कहते हैं, `एसआईआर के नाम पर अवैध तरीके से लोगों को मतदाता सूची से बाहर निकालना चौंकाने वाला है। इसमें सरकार का राजनीतिक स्वार्थ है। देश में आज जो हो रहा है वह चिंताजनक है। वोट देने का अधिकार संकट में है। हम ऐसे चुनाव आयोग को बहुत समय तक पद पर नहीं रख सकते, जो गलत काम में शामिल है।’ सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश रोहिंटन फली नरीमन के इस मत को भाजपा और उनके लोगों को समझना चाहिए। रोहिंटन नरीमन एक महान विद्वान, निष्पक्ष कानूनविद और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश हैं। देश में सत्तापक्ष की ओर से लोकतंत्र का गला घोंटने का जो प्रयास चल रहा है, उस पर उन्होंने चिंता जताई है। न्यायाधीश नरीमन की तरह ही देश के लेखकों, पत्रकारों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, प्रोफेसरों, सिविल सोसाइटी के लोगों, प्रशासनिक अधिकारियों, सेना और पुलिस को भी देश में लोकतंत्र की स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करने की आवश्यकता है। तभी देश बचेगा!

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