मुख्यपृष्ठस्तंभविजय-विमर्श : ज्ञानेश के चक्कर में बीजेपी की साख दांव पर

विजय-विमर्श : ज्ञानेश के चक्कर में बीजेपी की साख दांव पर

विजयशंकर चतुर्वेदी

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का छाता बनने की कवायद में बीजेपी की अपनी ही छतरी के छेद उजागर होने का खतरा पैदा हो गया है। बीजेपी के कार्यकाल में चुनाव आयोग की साख पर लगातार बढ़ते संकट की राजनीतिक कीमत बहुत बड़ी हो सकती है। मामला अब एक मुख्य चुनाव आयुक्त से निकलकर उस पूरी चुनावी व्यवस्था तक पहुंच रहा है, जिसका बचाव सत्तारूढ़ दल लगातार करता रहा है और अधिकतर समय लाभार्थी भी वही दिखता है। अब मामला ‘ज्ञानेश कुमार बनाम विपक्ष’ नहीं रह गया। यदि सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल रिकॉर्ड और न्यायिक जांच में गंभीर साबित होते हैं, तो जनता का अगला सवाल सीधे बीजेपी से होगा।
विपक्ष का निशाना मछली की आंख पर
विपक्ष को पता है कि यदि किसी संस्था की निर्णय-प्रक्रिया पर लगातार शक बना रहे तो हर नया तथ्य उसी कहानी में जुड़ता चला जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अब संबंधित रिकॉर्ड पर जवाब मांग लिया है। हालांकि, सर्वोच्च अदालत ने ज्ञानेश कुमार को हटाने या निलंबित करने जैसी कोई अंतरिम राहत अभी नहीं दी, लेकिन स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई निर्णय निर्धारित कानून या प्रक्रिया के अनुरूप नहीं पाया गया, तो उसकी समीक्षा की जा सकती है। इसलिए अब विपक्ष का सवाल केवल यह नहीं है कि ज्ञानेश कुमार ने क्या किया। पूछा यह जा रहा है कि चुनाव आयोग ने किसको लाभ पहुंचाने के लिए मनमाने पैâसले किए थे।
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार को मछली की आंख बना लिया है। अब उनके लिए जरूरी नहीं कि वे हर दिन नया आरोप लगाएं। उन्हें केवल इतना करना है कि न्याय मांगने पर अड़े रहें। विपक्ष के दमन से बीजेपी की लंबी सत्ता की वैधता पर जनता का प्रश्न और शक गहराता चला जाएगा।
भाजपा के लिए मुश्किल बचाव
ज्ञानेश कुमार के साथ खड़ा रहने में बीजेपी को असल मुश्किल तब होगी, जब उसका बचाव संदिग्ध प्रक्रियाओं की तरफ बढ़ेगा। यदि आयोग के रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि निर्णयों को लेकर भीतर सचमुच गंभीर मतभेद थे, तो मोदी सरकार से पूछा जाएगा कि वह आखिर किस बात की गारंटी दे रही थी। और यदि न्यायिक जांच किसी प्रक्रियागत खामी की पुष्टि करती है, तो यह सवाल और सीधा हो जाएगा कि संदिग्ध प्रक्रिया को किस लाभ-लोभ के चलते बीजेपी ने पूरी ताकत से अपना समर्थन दिया। सबसे बड़ी समस्या यह होगी कि तब तक यह मामला शीर्ष अदालत से निकलकर जनता की अदालत में चला जाएगा।
पिछले चुनाव भी शक के दायरे में होंगे
पिछले चुनावों को अवैध या संदिग्ध घोषित करने का कोई आधार अभी मौजूद नहीं है, लेकिन राजनीति में सवाल इस तरह नहीं चलते कि अदालत पहले पैâसला दे और उसके बाद ही जनता के मन में संदेह पैदा हो। यदि चुनाव आयोग की मौजूदा कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल टिकते हैं, तो पूछा जाएगा कि जिस संस्था पर आज सवाल उठ रहे हैं, उसके पहले के पैâसलों पर भरोसा किस आधार पर किया गया था? यही वह रास्ता है, जिससे विवाद ज्ञानेश कुमार से निकलकर पूरे चुनाव आयोग की मंशा तक पहुंच सकता है।
हर चुनाव परिणाम की वैधता के पीछे ठोस सार्वजनिक विश्वास होता है कि प्रक्रिया निष्पक्ष थी और उसका संचालन करने वाली संस्था भरोसेमंद है। उस भरोसे में दरार आए तो पुराने चुनावों के नतीजे भले नहीं बदलते, लेकिन उनके बारे में नए सवाल जरूर पैदा होते हैं। बीजीपी नेतृत्व के लिए परेशानी यह है कि पिछले चुनावों की विश्वसनीयता के सवाल से वह खुद को अलग नहीं कर सकता।
राहुल को निशाना बनाने से क्या मिलेगा?
राहुल गांधी और विपक्ष के विरोध-प्रदर्शनों पर बीजेपी प्रवक्ताओं का पलटवार स्वाभाविक राजनीतिक प्रतिक्रिया है, लेकिन इससे यह जवाब नहीं मिलता कि आयोग के भीतर से ही उठी आपत्तियों का क्या हुआ। यह भी स्पष्ट नहीं होता कि फॉर्म-६ में बदलाव किसने और किस प्रक्रिया के तहत किए। इसलिए बीजेपी इस विवाद को जितना राहुल गांधी के आचरण के इर्द-गिर्द केंद्रित करेगी, उतना ही विपक्ष के पास उसे प्रक्रिया और रिकॉर्ड पर वापस लाने का अवसर रहेगा।
बीजेपी का नैतिक संकट यह है कि क्या वह एक ऐसे व्यक्ति के बचाव में खड़ी होकर अनजाने में उस पूरी चुनावी व्यवस्था की जवाबदेही अपने ऊपर ले रही थी, जिसकी विश्वसनीयता उसकी सत्ता को वैधता प्रदान करती चली आ रही है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राष्ट्रीय नीति और सामाजिक मुद्दों पर नियमित लेखन करते हैं।)

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