मुख्यपृष्ठस्तंभफलसफा: हर दूरी नफरत की वजह से नहीं होती

फलसफा: हर दूरी नफरत की वजह से नहीं होती

सना खान

एक शिक्षक थे, जो अपने हर विद्यार्थी को अपने बच्चों की तरह मानते थे। उनमें से एक छात्र आरव, उनसे सबसे ज्यादा जुड़ा हुआ था। पढ़ाई से लेकर जीवन के हर छोटे-बड़े निर्णय में वह अपने गुरु की सलाह लिया करता था।
पढ़ाई पूरी होने के बाद आरव नौकरी के लिए दूसरे शहर चला गया। शुरुआत में वह हर सप्ताह अपने गुरु से बात करता था। फिर महीने में एक बार और धीरे-धीरे बातचीत लगभग बंद हो गई।
गांव में लोगों ने कहना शुरू कर दिया, ‘सफल होते ही लोग बदल जाते हैं। अब उसे अपने गुरु की याद कहां?’
शिक्षक हर बार मुस्कुरा देते। वे किसी से कुछ नहीं कहते, लेकिन रात को कई बार आरव का पुराना रिपोर्ट कार्ड और उसकी पहली लिखी हुई चिट्ठी निकालकर देख लेते। उन्हें विश्वास था कि उनका विद्यार्थी उन्हें भूला नहीं होगा।
कई वर्ष बीत गए।
एक दिन गांव में खबर फैली कि गुरुजी अगले सप्ताह सेवानिवृत्त होने वाले हैं। यह खबर सुनते ही आरव बिना किसी को बताए गांव के लिए निकल पड़ा।
समारोह के दिन वह सीधे मंच पर नहीं गया। सबसे पहले उसने अपने गुरु के चरण छुए और भर्राई आवाज में बोला, ‘गुरुजी, दूर मैं हुआ था, आपकी सीख नहीं। मैं रोज आपसे बात नहीं कर पाया, लेकिन जीवन के हर बड़े फैसले में आपकी आवाज मेरे साथ थी। लौटने में देर हो गई, भूलने में नहीं।’
शिक्षक की आंखें भर आईं।
उन्होंने आरव के कंधे पर हाथ रखा और कहा, ‘लोग कहते थे कि तुम बदल गए हो। मैंने कभी उन्हें जवाब नहीं दिया, क्योंकि मुझे अपने विद्यार्थी पर भरोसा था। मुझे पता था, दूरी बढ़ सकती है, संस्कार नहीं।’
पूरा सभागार कुछ क्षणों के लिए शांत हो गया।
उस दिन लोगों को एहसास हुआ कि उन्होंने दूरी देखकर फैसला सुना दिया था, जबकि सच्चाई बिल्कुल अलग थी। गुरु और शिष्य दोनों समझ चुके थे कि सच्चे रिश्तों की पहचान रोज की बातचीत से नहीं, बल्कि वर्षों बाद भी बने रहनेवाले विश्वास से होती है। कभी-कभी दूरियां सिर्फ कदमों के बीच होती हैं, दिलों के बीच नहीं। जहाँ विश्वास जीवित रहता है, वहां रिश्ते भी जीवित रहते हैं। बात यही है कि हर दूरी नफरत की वजह से नहीं होती। कई बार परिस्थितियां लोगों को दूर कर देती हैं, लेकिन सच्चे रिश्ते विश्वास और सम्मान के सहारे बने रहते हैं। रिश्ते दूरी से नहीं, भरोसे के खत्म होने से टूटते हैं।

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