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फलसफा : खामोशियों का सच

सना खान

जिंदगी हर दिन हमें कुछ सिखाती है, लेकिन हर सीख आवाज में नहीं मिलती। कुछ बातें सिर्फ तब समझ आती हैं जब हम बोलना छोड़कर महसूस करना शुरू करते हैं। खामोशी सिर्फ शब्दों की कमी नहीं होती, यह एक ऐसी भाषा है जिसे हर कोई सुन तो लेता है, पर हर कोई समझ नहीं पाता। कभी आपने महसूस किया है- जब आप बहुत कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन कहते कुछ नहीं और सामने वाला पूछता भी नहीं। वहीं से शुरू होता है खामोशियों का असली सच। फलसफा यह नहीं कि आप कितना बोलते हैं, बल्कि यह है कि आप क्या महसूस करते हैं और क्या अपने अंदर दबाकर जीते हैं। हम अक्सर अपनी तकलीफों को शब्द देने से डरते हैं, क्योंकि हमें डर होता है-
कि शायद सामने वाला समझेगा नहीं या समझकर भी अनदेखा कर देगा। इसलिए हम चुप रहना सीख जाते हैं।
धीरे-धीरे, वही चुप्पी हमारी आदत बन जाती है और फिर एक दिन,
हम खुद भी नहीं समझ पाते कि हम क्या महसूस कर रहे हैं। हम खुशी को बड़ी चीजों में ढूंढते हैं, पर सुकून अक्सर उन पलों में मिलता है जहां कोई सवाल नहीं होता, कोई सफाई नहीं देनी होती और कोई खुद को साबित नहीं करना पड़ता। कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जहां शब्दों की जरूरत ही नहीं पड़ती और कुछ ऐसे भी जहां सारी बातें कहने के बाद भी कुछ अधूरा रह जाता है। सच तो यह है कि हर किसी को समझना हमारी जिम्मेदारी नहीं और हर किसी से समझे जाने की उम्मीद अक्सर हमें ही तोड़ देती है। कभी-कभी खामोशी हार नहीं होती, वह एक चुनाव होता है- अपने सुकून को बचाने का, अपने आप को संभालने का। और शायद जिंदगी का सबसे गहरा सच यही है- जो हम कह नहीं पाते, वही हमें सबसे ज्यादा बदलता है।

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