सना खान
एक गांव में दो पड़ोसी रहते थे। एक दिन दोनों के बीच किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया। पहला पड़ोसी पूरे गांव में जाकर अपनी बात बताने लगा। उसने लोगों को बताया कि उसके साथ कितना गलत हुआ और दूसरा व्यक्ति कितना बुरा है। गांव के लोग उसकी बात सुनकर उसके पक्ष में हो गए। कुछ दिनों बाद दूसरे पड़ोसी ने भी अपनी बात रखी। तब लोगों को पता चला कि कहानी वैसी नहीं थी जैसी पहली बार सुनाई गई थी। दोनों की अपनी-अपनी मजबूरियां थीं, अपनी-अपनी परिस्थितियां थीं और अपनी-अपनी सच्चाई थी। तब गांव के एक बुजुर्ग ने कहा, ‘जब तक दोनों पक्ष न सुनो, तब तक किसी को सही या गलत मत ठहराओ। क्योंकि हर कहानी का एक दूसरा पहलू भी होता है।’
आज भी हमारी दुनिया कुछ ऐसी ही है। सोशल मीडिया पर, समाचारों में, रिश्तों में और रोजमर्रा की जिंदगी में हम अक्सर केवल एक पक्ष सुनकर राय बना लेते हैं। जो सबसे ज्यादा बोलता है, जरूरी नहीं कि वही सही हो। जो खामोश है, जरूरी नहीं कि वह गलत हो। सच अक्सर शोर से नहीं, समझ से मिलता है। इसलिए किसी भी कहानी पर विश्वास करने से पहले उसे हर कोण से देखना जरूरी है। हर कहानी में एक किरदार नहीं होता, कई किरदार होते हैं। हर घटना का एक नहीं, कई दृष्टिकोण होते हैं।
समझदार वही है जो केवल कहानी नहीं सुनता, बल्कि उसके पीछे छिपी सच्चाई को भी खोजता है।
हर सुनी हुई बात हकीकत नहीं होती,
हर दिखाई देने वाली तस्वीर मुकम्मल नहीं होती।
पैâसले करने से पहले थोड़ा ठहर जाया करो,
क्योंकि हर कहानी की सच्चाई एक जैसी नहीं होती।
