-सवालों के घेरे में आया महायुति सरकार का बचत दिखावा
सुनील ओसवाल / मुंबई
देश में महंगाई, पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें और विदेशी मुद्रा पर दबाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार मितव्ययिता और खर्च कटौती का संदेश दे रहे हैं। सरकारी मशीनरी को अनावश्यक खर्च रोकने, विदेश दौरों से बचने और र्इंधन बचत की नसीहत दी जा रही है। लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा नेतृत्व वाली महायुति सरकार की कार्रवाई ने अब खुद केंद्र सरकार के संदेश पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। पीएम की अपील को कूड़े में फेंकते हुए सीएम महाराष्ट्र के अफसरों और नेताओं का एक डेलिगेशन विदेशी टूर पर रवाना हो गया है।
बता दें कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के करीबी माने जाने वाले आर्थिक सलाहकार प्रवीण परदेशी के नेतृत्व में अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों का एक दल शनिवार को डेनमार्क के ‘स्टडी टूर’ पर रवाना हो गया। १६ से २४ मई तक चलने वाले इस विदेशी दौरे को लेकर अब राज्य की राजनीति में भूचाल आ गया है। हैरानी की बात है कि नगरविकास विभाग ने केंद्रीय गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय की मंजूरी के बाद इस दौरे का शासनादेश जारी किया।
प्रतिनिधिमंडल में शामिल नाम
इस प्रतिनिधिमंडल में महाराष्ट्र जीवन प्राधिकरण के सदस्य सचिव ए.एस.आर. नाईक, सोलापुर मनपा आयुक्त सचिन ओंबासे, स्थायी समिति सभापति रंजिता चाकोते और उमरेड की नगराध्यक्ष प्राजक्ता आदमाने समेत कई अधिकारी और जनप्रतिनिधि शामिल हैं।
डेनमार्क से सीखना है जल प्रबंधन और शहरी विकास!
तेल और विदेशी संकट के बीच महाराष्ट्र सरकार का एक प्रतिनिधिमंडल विदेश रवाना हो गया है। सरकार का दावा है कि डेनमार्क में पर्यावरण-अनुकूल शहरी विकास, जल प्रबंधन और आधुनिक तकनीक का अध्ययन किया जाएगा। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि ‘बचत’ के नाम पर जनता को उपदेश देने वाली सरकार खुद विदेशी दौरों पर पैसा बहा रही है।
दरअसल, हाल ही में केंद्र सरकार की ओर से र्इंधन बचत और खर्च नियंत्रण को लेकर गंभीर संदेश दिए गए थे। महाराष्ट्र के कई मंत्रियों ने भी अपने काफिले की गाड़ियां कम करने, बाइक से मंत्रालय आने और विदेश दौरे टालने की घोषणाएं की थीं, लेकिन अब उन्हीं घोषणाओं की हवा निकलती दिखाई दे रही है। विपक्ष ने इस पूरे मामले को ‘सरकार का दोहरा चेहरा’ करार दिया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि जनता से कहा जा रहा है कि पेट्रोल बचाओ, खर्च कम करो, लेकिन सत्ता में बैठे लोग सरकारी पैसों पर विदेश यात्रा कर रहे हैं। इससे साफ है कि मितव्ययिता सिर्फ भाषणों और वैâमरों तक सीमित है।
टाला जा सकता था दौरा
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि क्या इतने गंभीर आर्थिक माहौल में यह दौरा टाला नहीं जा सकता था? क्या ऑनलाइन प्रेजेंटेशन, वर्चुअल मीटिंग और डिजिटल अध्ययन के जरिए काम नहीं हो सकता था?
आखिर इस दौरे से राज्य को कितना फायदा होगा और उस पर कितना खर्च आएगा, इसका स्पष्ट जवाब अब तक सामने नहीं आया है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार के भीतर भी इस दौरे को लेकर असहजता बढ़ गई है, क्योंकि एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी सादगी और खर्च कटौती का संदेश दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ भाजपा शासित राज्य सरकार की यह कार्रवाई विपक्ष को बड़ा राजनीतिक हथियार दे सकती है।
