के.पी. मलिक
भारतीय लोकतंत्र में समय-समय पर कुछ ऐसे मुद्दे उभरते हैं, जो केवल नीतिगत बहस तक सीमित नहीं रहते, बल्कि देश की विकास दृष्टि और प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। अंडमान-निकोबार के सुदूर दक्षिण में स्थित ग्रेट निकोबार द्वीपसमूह पर प्रस्तावित विशाल परियोजना ने आज ठीक वैसी ही बहस को जन्म दिया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी का अचानक इस द्वीप की ओर रुख करना महज एक राजनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि उस विमर्श को केंद्र में लाने की कोशिश है, जिसे अब तक विकास के शोर में दबा दिया गया था।
कैसा मास्टर स्ट्रोक?
दरअसल, करीब ८१ हजार करोड़ रुपए की लागतवाली यह परियोजना, जिसमें ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, टाउनशिप और ऊर्जा संयंत्र शामिल हैं। जो सरकार के लिए एक रणनीतिक और आर्थिक मास्टरस्ट्रोक के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार इसे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की स्थिति को मजबूत करने और वैश्विक समुद्री व्यापार में हिस्सेदारी बढ़ाने का अवसर मानती है। मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित यह द्वीप निस्संदेह सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है और यही तर्क इस परियोजना की सबसे बड़ी ताकत भी है। लेकिन हर बड़े वादे के साथ कुछ बड़े सवाल भी खड़े होते हैं और यहीं से शुरू होती है इस परियोजना की असली कहानी।
विनाश की पटकथा!
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि यह परियोजना विकास के नाम पर पर्यावरणीय विनाश की पटकथा लिख रही है। ग्रेट निकोबार का पारिस्थितिकी तंत्र अत्यंत संवेदनशील है, जहां घने जंगल, दुर्लभ वन्यजीव और विशिष्ट जैव विविधता मौजूद है। हजारों पेड़ों की कटाई और बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियां इस संतुलन को स्थायी रूप से बिगाड़ सकती हैं। यह केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, बल्कि उस प्राकृतिक विरासत का सवाल है, जिसे एक बार खो देने के बाद वापस पाना असंभव होगा। इससे भी अधिक गंभीर चिंता वहां के आदिवासी समुदायों को लेकर है। शोंपेन जैसे अत्यंत संवेदनशील और अलग-थलग रहनेवाले समुदाय इस द्वीप की पहचान हैं। विकास की चमक अगर उनके अस्तित्व और संस्कृति पर भारी पड़ती है, तो यह केवल एक नीतिगत विफलता नहीं, बल्कि नैतिक असफलता भी होगी। सरकार इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहती है कि सभी पर्यावरणीय मंजूरियां नियमों के तहत ली गई हैं और परियोजना को ‘सस्टेनेबल’ तरीके से विकसित किया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत की अब तक की विकास यात्रा ने हमें यह भरोसा दिया है कि इतने बड़े पैमाने पर निर्माण बिना गंभीर पर्यावरणीय क्षति के संभव है? विशेषज्ञों की राय भी इस मुद्दे को ब्लैक एंड व्हाइट में नहीं देखती। एक ओर रणनीतिक विश्लेषक इसे भारत की समुद्री शक्ति को मजबूत करने के लिए जरूरी बताते हैं, वहीं पर्यावरणविद् इसे ‘अपरिवर्तनीय क्षति’ का जोखिम मानते हैं। सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं है, जहां विकास की जरूरत भी है और संरक्षण की अनिवार्यता भी।
विकासकर्ता या विनाशक
दरअसल, ग्रेट निकोबार विवाद किसी एक परियोजना का विरोध या समर्थन नहीं है; यह उस विकास मॉडल पर बहस है जिसे भारत अपना रहा है। क्या हम अब भी बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स को ही प्रगति का पैमाना मानेंगे या फिर पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को भी उतनी ही प्राथमिकता देंगे? नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का निकोबार का एकाएक दौरा इस बहस को राजनीतिक रंग जरूर देता है, लेकिन इससे मुद्दे की गंभीरता कम नहीं होती।
उतना ही जरूरी यह भी है कि विपक्ष केवल आलोचना तक सीमित न रहे, बल्कि ठोस और व्यावहारिक विकल्प भी सामने रखे। यह सवाल सरकार और विपक्ष दोनों के सामने है कि क्या विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन केवल भाषणों में रहेगा या इसे जमीन पर भी उतारा जाएगा? ग्रेट निकोबार आज एक द्वीप से कहीं अधिक बन चुका है; यह भारत के भविष्य की दिशा का प्रतीक है। यहां लिया गया निर्णय केवल एक परियोजना का नहीं, बल्कि उस सोच का होगा जो तय करेगी कि आने वाली पीढ़ियां हमें विकासकर्ता के रूप में याद करेंगी या विनाश के सूत्रधार के रूप में।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
