मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका : इथेनॉल के नाम पर मोदी सरकार की लूट!

पॉलिटिका : इथेनॉल के नाम पर मोदी सरकार की लूट!

के.पी. मलिक
केंद्र सरकार की पेट्रोल में २० फीसदी इथेनॉल मिश्रित ई-२० नीति पर अब सवाल खड़े हो रहे हैं और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। अधिवक्ता अक्षय मल्होत्रा की जनहित याचिका में साफ कहा गया है कि यह नीति उपभोक्ताओं को लूटने और गुमराह करने वाली है। भारत में आज भी पेट्रोल का कर रहित आधार मूल्य ५५-६० रुपए प्रति लीटर ही है। दूसरी ओर इथेनॉल की कीमत सरकार ने अनाज आधारित इथेनॉल की कीमत ६२.५०-६५ रुपए प्रति लीटर और गन्ना आधारित ६४-६९ रुपए प्रति लीटर तय की हुई है। यानी इथेनॉल पेट्रोल से सस्ता नहीं बल्कि महंगा है। फिर भी कंपनियां पेट्रोल में २० फीसदी इथेनॉल मिलाकर उपभोक्ताओं से वही कीमत वसूल रही हैं, जबकि ईंधन की गुणवत्ता घट रही है।
असली खेल
शुद्ध पेट्रोल यानी ई-० बेहतर माइलेज देता है और इंजन की सुरक्षा करता है। जबकि ई-२० पेट्रोल कम माइलेज, इंजन पर खराब असर करता है, लेकिन कीमत बराबर है जिससे ग्राहक की जेब कट रही है। यानी सरकार और कंपनियां उपभोक्ताओं से महंगे का पैसा लेकर घटिया माल बेच रही हैं।
दरअसल, इथेनॉल युक्त पेट्रोल गाड़ियों के लिए ‘धीमा जहर’ माना जा रहा है। ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग संस्थानों की रिपोर्ट बताती है कि अप्रैल २०२३ से पहले बनी गाड़ियों में से ७० फीसदी वाहन ई-२० पेट्रोल के लिए उपयुक्त नहीं हैं। यहां तक कि कई बीएस-६ गाड़ियां भी इसके लिए डिजाइन नहीं की गईं। ई-२० पेट्रोल से इंजन पार्ट्स पर जंग लगना, रबड़ और प्लास्टिक का जल्दी घिसना और ईंधन दक्षता में ६-७ फीसदी तक की गिरावट देखी गई है। यानी उपभोक्ता उतना ही पैसा खर्च कर रहा है, लेकिन उसकी गाड़ी की सेहत और जेब दोनों पर वार हो रहा है। इसी दौरान बीमा कंपनियों को ग्राहकों को पैंतरा दिखाने का अवसर मिल रहा है। ई-२० से हुए नुकसान पर ज्यादातर बीमा कंपनियां क्लेम पास करने से इनकार कर रही हैं। उनका तर्क है कि यह नुकसान ‘ईंधन की गुणवत्ता’ की वजह से है, जो बीमा पॉलिसी के दायरे में नहीं आता।
सरकार की इस गलत नीति का नतीजा यह हुआ कि उपभोक्ता महंगा पेट्रोल खरीदे, जिससे गाड़ी खराब हो और बीमा कंपनी हाथ खड़े कर दे यानी यह तीर से नहीं, नीति से किया गया शिकार है। भारत में पारदर्शिता की कमी की अमेरिका और यूरोप से तुलना की जाए तो अमेरिका में ई-०, ई-१०, ई-१५ और ई-८५ सभी विकल्प उपलब्ध हैं। उपभोक्ता खुद चुन सकता है कि कौन-सा ईंधन उसकी गाड़ी के लिए ठीक है। यूरोप में भी पेट्रोल पंपों पर स्पष्ट लेबलिंग होती है कि ईंधन में कितना इथेनॉल है। जबकि भारत में उपभोक्ता को कोई विकल्प नहीं बल्कि मजबूरी का नाम ई-२० है।
ये कैसा छल?
दरअसल यह सीधा-सीधा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, २०१९ का उल्लंघन है, जो जानकारी और विकल्प का अधिकार देता है। इस सारे मामले में कहीं न कहीं असली खेल पर्यावरण के नाम ऑटोमोबाइल लॉबी कर रही है? जबकि सरकार दावा करती है कि ई-२० से कार्बन उत्सर्जन १५-२० फीसदी तक कम होगा। लेकिन सच्चाई यह है कि इथेनॉल उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर गन्ना और अनाज चाहिए, जिससे पहले से जूझ रहे किसानों पर दबाव बढ़ेगा। गन्ना आधारित इथेनॉल से भारी जल दोहन होता है आंकड़ों के मुताबिक १ लीटर इथेनॉल बनाने में करीब २,८६० लीटर पानी लगता है। यानी यह नीति न तो उपभोक्ता हित में है, न ही किसानों और पर्यावरण के लिए व्यावहारिक। असल में यह नीति इथेनॉल लॉबी और तेल कंपनियों को फायदा पहुंचाने का जरिया बन गई है।
बहरहाल, इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट में इस नीति पर सवाल उठ रहे हैं। मल्होत्रा की याचिका में मांग की गई है कि देश के सभी पेट्रोल पंपों पर ई-० (इथेनॉल-फ्री पेट्रोल) उपलब्ध कराया जाए। पंपों पर स्पष्ट लेबलिंग हो कि ईंधन में कितना इथेनॉल मिला है। उपभोक्ताओं को बताया जाए कि उनका वाहन ई-२० के लिए उपयुक्त है या नहीं। सरकार एक राष्ट्रीय स्तर पर अध्ययन कराए कि ई-२० का वाहनों पर क्या असर पड़ा है। हालांकि सरकार इसे पर्यावरण बचाने का कदम बताती है, लेकिन हकीकत में यह उपभोक्ता पर थोपा गया बोझ है। आम आदमी कीमत वही चुका रहा है, लेकिन ईंधन की गुणवत्ता घट रही है। गाड़ियों का इंजन खराब हो रहा है, और मरम्मत का खर्च उपभोक्ता की जेब काट रहा है। किसानों और पर्यावरण पर भी नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ही तय करेगा कि यह नीति सही है या नहीं। लेकिन सवाल साफ है कि क्या यह सचमुच हरित भविष्य की ओर कदम है या फिर आम आदमी की कमर तोड़ने की सरकारी साजिश?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं तल्ख टिप्पणीकार हैं)

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