मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका : राम का धन किसने किया गबन! ... जनता का प्रश्न

पॉलिटिका : राम का धन किसने किया गबन! … जनता का प्रश्न

के.पी. मलिक

अयोध्या में भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण केवल एक धार्मिक परियोजना नहीं था, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था, त्याग और विश्वास का प्रतीक था। देश-विदेश के लाखों श्रद्धालुओं ने अपनी श्रद्धा के अनुसार दान दिया। ऐसे में यदि मंदिर के चढ़ावे, नकदी या बहुमूल्य धातुओं के प्रबंधन को लेकर किसी भी प्रकार के वित्तीय अनियमितता के आरोप सामने आते हैं तो यह केवल एक प्रशासनिक या कानूनी मामला नहीं रह जाता, बल्कि सीधे-सीधे जनविश्वास और धार्मिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से जुड़ जाता है।
हाल के दिनों में अयोध्या राम मंदिर की दान-पेटियों से पांच से साढ़े सात करोड़ रुपए के कथित गायब होने के आरोपों ने राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है। इस विवाद में समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व मंत्री पवन पांडे, सपा प्रमुख अखिलेश यादव, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र तथा ट्रस्ट के पूर्व लेखा-प्रभारी महिपाल सिंह जैसे नाम सामने आए हैं। आरोप, प्रत्यारोप और खंडन के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि सत्य क्या है और जनता को उस सत्य तक पहुंचने का अधिकार कब मिलेगा?
पूर्व मंत्री पवन पांडे ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि मंदिर की दान-पेटियों से करोड़ों रुपए की राशि का हिसाब स्पष्ट नहीं है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चढ़ावे के प्रबंधन और लेखांकन में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं। इसी क्रम में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई। उनका तर्क है कि जब करोड़ों लोगों की आस्था और अरबों रुपए के दान का प्रश्न हो, तब किसी भी प्रकार के संदेह को केवल बयान देकर समाप्त नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार और राजनीतिक प्रेरित बताया है। उनका कहना है कि दान की पूरी प्रक्रिया व्यवस्थित है और सभी लेन-देन का रिकॉर्ड उपलब्ध है। मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र ने भी किसी प्रकार की वित्तीय अनियमितता से इनकार किया है।
महिपाल सिंह के दावे क्यों महत्वपूर्ण हैं?
इस पूरे विवाद को गंभीर बनानेवाला पहलू ट्रस्ट के पूर्व लेखा-प्रभारी महिपाल सिंह के बयान हैं। यदि कोई आरोप बाहरी राजनीतिक व्यक्ति लगाता है तो उसे राजनीतिक आरोप कहकर खारिज किया जा सकता है, लेकिन जब वित्तीय व्यवस्था से जुड़े रहे किसी व्यक्ति द्वारा सवाल उठाए जाते हैं तो स्वाभाविक रूप से मामले की गंभीरता बढ़ जाती है।
महिपाल सिंह ने कथित तौर पर दान की गिनती, लेखांकन और निगरानी से जुड़े कुछ मुद्दों पर सवाल उठाए हैं। यदि उनके दावे सही हैं तो जांच आवश्यक है और यदि गलत हैं तो जांच के माध्यम से उन्हें भी स्पष्ट रूप से खारिज किया जाना चाहिए।
कैमरा फुटेज और सोने-चांदी का प्रश्न
विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू सीसीटीवी फुटेज और बहुमूल्य चढ़ावे के रिकॉर्ड से जुड़ा है। प्रश्न उठ रहे हैं कि दान-पेटियों को खोलने और गिनती की पूरी प्रक्रिया का वीडियो रिकॉर्ड उपलब्ध है या नहीं? यदि है तो उसे जांच एजेंसियों को क्यों न सौंपा जाए? सोने, चांदी और अन्य बहुमूल्य वस्तुओं का स्वतंत्र ऑडिट हुआ है या नहीं? प्राप्त चढ़ावे और दर्ज अभिलेखों में पूर्ण सामंजस्य है या नहीं?
धार्मिक संस्थानों में वित्तीय पारदर्शिता का सबसे बड़ा आधार यही होता है कि रिकॉर्ड, ऑडिट और निगरानी प्रणाली किसी भी संदेह की स्थिति में तत्काल सत्यापन योग्य हो।
चौबीस घंटे में एसआईटी गठन: विश्वास या दबाव?
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मामले में विशेष अन्वेषण दल (एसआईटी) का गठन अपेक्षाकृत तेजी से किया गया। इसे दो तरह से देखा जा रहा है। एक पक्ष का मानना है कि सरकार ने संवेदनशीलता दिखाते हुए तत्काल जांच शुरू कर दी, जिससे यह संदेश गया कि किसी भी आरोप को गंभीरता से लिया जाएगा। दूसरा पक्ष सवाल उठा रहा है कि क्या जांच केवल निचले स्तर तक सीमित रहेगी या यदि आवश्यकता पड़ी तो ट्रस्ट से जुड़े प्रभावशाली पदाधिकारियों तक भी पहुंचेगी? यहीं से जांच की निष्पक्षता की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है।
सबसे बड़ा सवाल: आस्था की रक्षा कैसे होगी?
यह समझना आवश्यक है कि राम मंदिर किसी एक राजनीतिक दल, संगठन या व्यक्ति की संपत्ति नहीं है। यह करोड़ों श्रद्धालुओं की सामूहिक आस्था का केंद्र है इसलिए मंदिर से जुड़े किसी भी आरोप पर दो अतिवादी प्रतिक्रियाएं उचित नहीं हैं। पहली प्रतिक्रिया यह कि बिना जांच के सभी आरोपों को सत्य मान लिया जाए। दूसरी प्रतिक्रिया यह कि केवल इसलिए सभी आरोपों को झूठा घोषित कर दिया जाए, क्योंकि मामला राम मंदिर से जुड़ा है। लोकतांत्रिक और उत्तरदायी दृष्टिकोण यही है कि तथ्यों को सामने आने दिया जाए और जांच को स्वतंत्र रूप से अपना काम करने दिया जाए।
ट्रस्ट पर भी जिम्मेदारी
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पर केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है। यदि आरोप गलत हैं तो सबसे पहले ट्रस्ट को ही अधिकतम पारदर्शिता दिखानी चाहिए। स्वत्ांत्र फॉरेंसिक ऑडिट कराया जाए। वार्षिक वित्तीय रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। दान प्रबंधन की प्रक्रिया को डिजिटल रूप से उपलब्ध कराया जाए। सीसीटीवी और रिकॉर्ड की जांच में पूर्ण सहयोग दिया जाए। ऐसे कदम किसी भी आरोप का सबसे प्रभावी उत्तर होंगे।
बहरहाल, अयोध्या राम मंदिर का प्रश्न राजनीति से बड़ा है और किसी भी दल के हित-अहित से कहीं ऊपर है। यदि चोरी हुई है तो दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसे कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए और यदि आरोप झूठे हैं, तो जांच के माध्यम से सत्य सामने आना चाहिए, ताकि मंदिर और ट्रस्ट की प्रतिष्ठा पर लगा संदेह समाप्त हो सके। रामायण हमें सिखाती है कि भगवान राम का सबसे बड़ा गुण न्याय और मर्यादा था। इसलिए राम के नाम पर बने मंदिर में भी न्याय, पारदर्शिता और जवाबदेही सर्वोच्च होनी चाहिए। प्रश्न केवल इतना नहीं है कि पैसा कहां गया। प्रश्न यह है कि करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास किस प्रकार सुरक्षित रखा जाएगा, क्योंकि राम मंदिर की सबसे बड़ी संपत्ति उसका खजाना नहीं, बल्कि जनता की आस्था है।
(लेखक दैनिक भास्कर के राजनीतिक संपादक हैं)

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