मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत : अंपायर पर सवाल हो तो मैच कौन जीतेगा?

रुख-ए-सियासत : अंपायर पर सवाल हो तो मैच कौन जीतेगा?

तौसीफ कुरैशी

चुनाव लोकतंत्र का मैच है और चुनाव आयोग उसका अंपायर। लेकिन वह मिल गए हैं, ऐसा मैं नहीं, जनता महसूस कर रही है और यह किसी हद तक सही भी लगता है, क्योंकि ज्ञानेश कुमार के फैसले सत्तापक्ष को लाभान्वित करते दिखते हैं और दो अन्य सदस्य उनके फैसलों पर असहमति व्यक्त करते हैं। इसके बाद मामला और अधिक पेचीदा हो जाता है।
खिलाड़ी बदलते रहते हैं, कप्तान आते-जाते रहते हैं, सरकारें बनती-बिगड़ती रहती हैं, मगर अंपायर पर भरोसा बना रहना चाहिए। क्योंकि जिस दिन खिलाड़ी ही नहीं, दर्शक भी अंपायर की उंगली पर शक करने लगें, उस दिन सवाल हार-जीत का नहीं रहता, पूरे खेल की विश्वसनीयता का हो जाता है। आज चुनाव आयोग को लेकर यही सवाल सिर उठाता दिखाई दे रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर राजनीतिक दलों के आरोप अपनी जगह हैं, लेकिन उससे भी ज्यादा गंभीर बात अब आयोग के भीतर मतभेदों की खबरें हैं। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची और एसआईआर से जुड़े मुद्दों पर कई बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। जैसे गलत आदमी अपनी गलती को छिपाने के लिए इधर-उधर की बातें कर लीपापोती करता है, वैसे ही आयोग ने इन रिपोर्टों को लेकर कहा कि आंतरिक असहमति संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए। यानी आयोग कह रहा है, सब ठीक है। उसको ऐसा ही कहना भी चाहिए। बाहर से खबरें कह रही हैं, कुछ भी ठीक नहीं है। हिंदू-मुस्लिम के बीच नफरत में फंसी अब बेचारी भेड़-बकरियां जनता करे तो क्या करे? जनता के पास न आयोग की फाइल है, न बैठकों की पूरी कार्यवाही। उसके पास सिर्फ खबरें हैं, बयान हैं और वोट है, जो उसका नहीं है। यही वह जगह है, जहां लोकतंत्र की असली परीक्षा शुरू होती है। क्योंकि चुनाव आयोग का सबसे बड़ा अधिकार उसका संवैधानिक पद नहीं, उसकी विश्वसनीयता है। आप कानून बना सकते हैं। आप नियम बना सकते हैं। आप अधिकारी नियुक्त कर सकते हैं। लेकिन जनता का भरोसा नियुक्ति-पत्र से नहीं मिलता। वह काम से मिलता है और भरोसा पारदर्शिता से बनता है।
अगर दो आयुक्तों ने पैâसलों पर आपत्ति की, तो बेचारी जनता को यह जानने का हक है कि आपत्ति क्या थी और उसका निपटारा वैâसे हुआ। अगर सारी प्रक्रिया नियमों के मुताबिक हुई, तो कागज सामने रखिए और बहस खत्म कीजिए। लोकतंत्र में सबसे आसान रास्ता है, ‘हमने सब नियमों के मुताबिक किया।’ लेकिन सबसे मजबूत रास्ता है, ‘ये रहे दस्तावेज, आप खुद देख लीजिए।’ चुनाव आयोग को निर्दोष बताने से पहले भी पारदर्शिता चाहिए, यही लोकतांत्रिक कसौटी है।
असहमति लोकतंत्र की कमजोरी है या उसकी सुरक्षा-व्यवस्था?
अब इसी बीच अशोक लवासा का नाम फिर चर्चा में आ गया है। पूर्व चुनाव आयुक्त लवासा ने एसआईआर और फॉर्म-६ से जुड़े बदलावों की कानूनी प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि चुनावी प्रक्रिया में छोटी-सी प्रशासनिक व्यवस्था भी करोड़ों मतदाताओं के अधिकार को प्रभावित कर सकती है। और फिर वही पुराना सवाल सामने खड़ा है, असहमति लोकतंत्र की कमजोरी है या उसकी सुरक्षा-व्यवस्था? अगर दो आयुक्त सवाल पूछते हैं, तो उन्हें दुश्मन समझना गलत होगा। लेकिन अगर सवाल पूछे जाएं और जवाब जनता तक न पहुंचे, तब शक पैदा होना स्वाभाविक है। इधर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज है। विपक्षी दलों ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं और उनकी भूमिका पर सवाल उठाए हैं। इन दावों के बीच फैसला किसी अडानी जैसों के पालतू टीवी स्टूडियो में नहीं होगा। पैâसला दस्तावेजों को करना है। और सबसे आखिर में बेचारी जनता को करना है, जो हर तरह से पिस रही है।
यही कारण है कि केंद्रीय एजेंसियों की संभावित कार्रवाई से जुड़े दावों को भी सावधानी से देखना होगा। मुद्दा यह है कि क्या चुनाव आयुक्त सत्ता से स्वतंत्र होकर असहमति दर्ज कर सकता है? अगर हां, तो असहमति सार्वजनिक रिकॉर्ड का सम्मान होना चाहिए। अगर नहीं, तो लोकतंत्र को अपनी सबसे जरूरी संस्थाओं में से एक की संरचना पर फिर से विचार करना होगा। और यहां सरकारों को भी एक बात याद रखनी चाहिए। आज अगर चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल विपक्ष पूछ रहा है, कल सत्ता बदलने पर वही सवाल किसी और सरकार के सामने खड़ा हो सकता है। संस्थाएं सरकारों की सुविधा के हिसाब से नहीं चलतीं। सरकारें संस्थाओं के नियमों के हिसाब से चलती हैं। वरना लोकतंत्र धीरे-धीरे चुनाव से बचकर सिर्फ चुनावी तमाशा रह जाएगा। और तमाशे में सबसे ज्यादा तालियां वही बजाता है, जिसे लगता है कि अंपायर उसके साथ है। लेकिन असली मैच तब खराब होता है, जब दूसरे पक्ष को यकीन हो जाए कि अंपायर उसके खिलाफ है। इसलिए आज सबसे जरूरी काम किसी एक अधिकारी को हटाना या बचाना नहीं है। सबसे जरूरी काम है भरोसा बचाना।
वोटर को यह भरोसा होना चाहिए कि उसका नाम मतदाता सूची में इसलिए है, क्योंकि वह पात्र है; इसलिए नहीं कि सत्ता चाहती है। उसका नाम इसलिए नहीं हटाया गया, क्योंकि वह किसी पार्टी का समर्थक माना गया। और उसका वोट इसलिए नहीं बचाया गया, क्योंकि वह किसी पार्टी के पक्ष में था। मतदाता नागरिक है। उसका वोट किसी सरकार की कृपा नहीं। यही लोकतंत्र का मूल है। इसलिए चुनाव आयोग से सिर्फ इतना सवाल है, बताइए, फाइल में क्या लिखा है? किसने क्या कहा? किसने क्या आपत्ति की? किस आधार पर पैâसला हुआ? और किस नियम के तहत हुआ? बस.., अगर जवाब साफ है, तो विवाद खत्म। अगर जवाब गोल है, तो सवाल और बढ़ेंगे। क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछने वाला नागरिक दुश्मन नहीं होता। वह असली मालिक होता है और चुनाव आयोग का असली काम किसी सरकार को जिताना या हराना नहीं, उस मालिक के वोट पर भरोसा कायम रखना है। इसलिए आज सवाल यह नहीं कि ज्ञानेश कुमार की फील्डिंग कौन सेट कर रहा है। सवाल यह है कि मैदान में अंपायर कौन है, नियम क्या हैं और क्या दोनों टीमों को यकीन है कि अंपायर की उंगली वोट देखकर नहीं, नियम देखकर उठेगी? यही सवाल लोकतंत्र का असली रिव्यू है। और इस रिव्यू में पैâसला किसी टीवी चैनल की बहस नहीं करेगी। बेचारी जनता करेगी।
सत्यमेव जयते।

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