प्रणव प्रियदर्शी
इतिहास में तमाम राजाओं और सत्ताधीशों के उदाहरण मौजूद हैं कि वैâसे उन सबने ताज हासिल करने के बाद अपनी ऊर्जा सबसे ज्यादा यह सुनिश्चित करने में लगाई कि उनकी सत्ता को कहीं से चुनौती न मिल सके। वैसे राजा-महाराजाओं के दौर में यह स्वाभाविक ही नहीं, जरूरी भी था।
दो उदाहरण
हां, किसी लोकतांत्रिक देश में इस तरह के आचरण को कुछ हद तक स्वाभाविक भले मान लिया जाए, उचित नहीं कहा जा सकता। एक हद के बाद तो यह प्रवृत्ति अलोकतांत्रिक और तानाशाहीपूर्ण हो जाती है। अपने देश के संसदीय इतिहास में दो ही प्रधानमंत्री ऐसे हैं, जिन पर निर्विवाद ढंग से यह आरोप लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी सत्ता को स्थायित्व देने के लिए लोकतांत्रिक मर्यादाओं का सीमोल्लघन करने में कोई संकोच नहीं किया- इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी। इंदिरा गांधी ने घोषित तौर पर आपातकाल लगाकर देशवासियों के अधिकारों में कटौती की तो नरेंद्र मोदी बगैर आपातकाल घोषित किए ही नागरिकों के अधिकार छीनते चले गए। जो आपतकाल से भी ज्यादा भयानक है और संविधान को कमजोर करने की सोची-समझी साजिश है, ताकि सत्ता बनी रहे और संविधान में मनचाहे बदलाव किए जा सकें।
लोकतांत्रिक औजार
ध्यान रहे, केंद्र में मोदी सरकार का दौर शुरू होने से पहले लगातार दस साल मनमोहन सिंह सरकार थी। तब नरेंद्र मोदी गुजरात के सीएम थे और उनकी पार्टी संसद में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभा रही थी। उस दौर में विपक्षी पार्टी ने जिन लोकतांत्रिक औजारों का इस्तेमाल सत्तारूढ़ दल को घेरने में किया, खुद सरकार बनाने के बाद पीएम मोदी ने एक-एक करके उन सारे टूल्स को या तो खत्म कर दिया या फिर पूरी तरह निष्क्रिय बना दिया।
सूचना न पहुंचे
चाहे मीडिया की स्वतंत्रता हो या सूचना का अधिकार- तरह-तरह की पाबंदियों के जरिए मोदी सरकार ने यह सुनिश्चित किया कि देशवासियों तक सूचनाएं सहजता से न पहुंचें और देश में बन रहे नैरेटिव पर उसका एकाधिकार रहे। इसी एकाधिकार के जरिए सत्तारूढ़ दल लगभग हर मुद्दे को हिंदू-मुस्लिम का रूप देता रहा और वक्त-जरूरत उग्र राष्ट्रवाद की भावनाएं भड़काता रहा।
विपक्षी नेता के माइक
जब ये सब नाकाफी लगने लगा तो उसने नए तरीके आजमाए। देश के इतिहास में पहली बार संसद में विपक्षी नेता के माइक बंद करने जैसे आरोप इसी दौर में लगे। यही नहीं चुनाव आयोग की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर भी संदेह के बादल छा गए। चुनाव आयोग विपक्षी दलों की शिकायतें दूर करते हुए दिखने के बजाय खुद उन्हीं पर आरोप लगाता नजर आने लगा। इसी आयोग की देखरेख में एघ्R अभियान चलाया गया जिसके तहत लाखों नागरिकों से वोट देने का अधिकार छीन लिया गया। अचरज की बात यह कि सुप्रीम कोर्ट भी नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने में तत्पर नहीं दिखा।
आएगा तो मोदी ही
इन तमाम उपायों की बदौलत मोदी सरकार यह लगभग सुनिश्चित करती जा रही थी कि वह चाहे जो भी और जैसे भी कदम उठाए, विपक्षी दल उस पर जितनी भी हाय-तौबा मचाएं, चुनाव तो वही जीतेगी। हाल के तमाम अहम चुनावी मुकाबलों के नतीजे इस स्थिति की गवाही देते हैं। फिर भी, शायद कुछ कसर रह गई थी, जिसे पूरा करने के लिए सत्तारूढ़ दल ने विपक्षी दलों के विधायक और सांसद तोड़ने शुरू कर दिए। मोदी सरकार शायद बिना चुनाव करवाए ही संसद में दो तिहाई बहुमत हासिल करने के प्रयास में थी।
टीवी नहीं देखते
मगर इसी बीच जंतर-मंतर पर जेन-जी का आंदोलन शुरू हो गया, जिसने इस सरकार द्वारा खड़े किए गए तमाम माया जाल को एक पल में ध्वस्त कर दिया। गोदी मीडिया द्वारा तैयार किए गए मोदी की दृढ़ता और अपराजेयता के सारे भ्रम देखते-देखते टूट गए। इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि इसके पीछे नई पीढ़ी के जो युवा थे, वे टीवी नहीं देखते। यानी गोदी मीडिया के सारे अभियानों से वे अप्रभावित हैं। सोशल मीडिया की सत्ता पोषित ट्रोल आर्मी भी इन युवाओं पर ज्यादा असरदार साबित नहीं हुई, क्योंकि ये खुद इस फील्ड के बादशाह हैं।
आखिरी दांव भी बेकार
आखिरी बात यह कि मोदी सरकार का सबसे बड़ा हथियार यानी ईडी-सीबीआई जैसी एजेंसियां भी यहां किसी काम की नहीं साबित हुर्इं। पुलिस का डंडा इस्तेमाल करने की कोशिश जरूर सरकार ने की, लेकिन वह दांव भी बेकार गया। पुलिसिया दमन से कमजोर पड़ने के बजाय इन युवाओं का जज्बा और ज्यादा मजबूत हो गया। उसके बाद सरकार के हाथ-पांव फूल गए। न केवल पीएम मोदी की चुप्पी टूटी, बल्कि दो दिन में दो बार वीडियो संदेश के जरिए उन्होंने इन युवाओं को बहलाने-फुसलाने की कोशिश की। मगर युवा अब शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से कम किसी भी बात के लिए तैयार नहीं थे। लिहाजा, अगले दिन धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा आ गया।
अहम संदेश
आंदोलन भले समाप्त हो गया हो, इसने कुछ ऐसे संदेश मजबूती से स्थापित कर दिए हैं, जिनका असर आसानी से समाप्त नहीं होनेवाला: एक, इसने मौजूदा सत्ता के अहंकार को चूर-चूर कर दिया है। दो, जनता की सर्वोच्चता एक बार फिर कायम हो गई है। तीन, यह भ्रम टूट गया है कि हर मसले को हिंदू-मुस्लिम रंग दिया जा सकता है। चार, सस्ती और अच्छी शिक्षा का सवाल विमर्श के केंद्र में आ गया है। और आखिरी, गोदी मीडिया बेनकाब हो गई है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)
