प्रणव प्रियदर्शी
पश्चिम बंगाल में शनिवार को तृणमूल कांग्रेस नेता अभिषेक बनर्जी और फिर रविवार को पार्टी सांसद कल्याण बनर्जी पर हुआ हमला, कम से कम चौंकानेवाला नहीं कहा जा सकता। हालिया, विधानसभा चुनावों के बाद से ही वहां जैसा माहौल बना हुआ था, जिस तरह की घटनाएं हो रही थीं और जैसी बयानबाजी की जा रही थी, उनमें ऐसे हमलों की संभावना से कतई इनकार नहीं किया जा सकता था।
उम्मीद से उलट
लाखों मतदाताओं के नाम काटने के अलावा भी पूरी चुनाव प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग का रुख कभी ऐसा रहा ही नहीं जिससे यह लगे कि वह एक निष्पक्ष चुनाव करवा रहा है और उसका मकसद पक्ष-विपक्ष दोनों को विश्वास में लेकर आगे बढ़ना है। खैर जैसे भी हुए हों, चुनाव समाप्त हुए और राज्य में सत्ता बदली। उसके बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि कम से कम अब सत्तारूढ़ बीजेपी चुनावी मोड से बाहर आएगी और उसकी सरकार कानून व्यवस्था समेत तमाम जिम्मेदारियां संभाल लेगी।
पुलिस क्यों नहीं
लेकिन चुनाव नतीजे आने के बाद भी बीजेपी नेता तृणमूल राज पर निशाना साधते रहे। जगह-जगह तृणमूल कार्यालयों पर हमले हुए, तृणमूल के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा हुई। ऐसी ही चुनावोत्तर हिंसा की घटना में मारे गए एक तृणमूल कार्यकर्ता के परिवार से मिलने अभिषेक बनर्जी सोनारपुर गए थे जहां उन पर हमला हुआ। सवाल है कि ऐसे नाजुक हालात में हुई उनकी यात्रा के दौरान पुलिस के ठोस इंतजाम क्यों नहीं थे। प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने भी घटना में पार्टी का हाथ होने से इनकार किया, लेकिन कहा कि उस दौरान वहां पुलिस क्यों नहीं थी, यह उन्हें नहीं पता।
चौतरफा घेराव
ध्यान रहे, जिस दिन अभिषेक बनर्जी पर हमला हुआ, उसी दिन राज्य पुलिस की सीआईडी उनके घर नोटिस लेकर भी पहुंची। यह नोटिस फर्जी हस्ताक्षर से जुड़े किसी मामले का बताया जाता है, लेकिन इससे इतना तो साफ होता ही है कि राज्य की नई सत्ता तृणमूल नेतृत्व को घेरने की कोशिशें हर तरफ से और हर मोर्चे पर कर रही है। तृणमूल सांसदों के पार्टी छोड़ने के संकेत भी इस बात की पुष्टि करते हैं।
क्या होगा असर
ऐसे में बड़ा सवाल यह हो जाता है कि तृणमूल नेताओं पर हुआ यह हमला पार्टीजनों के मनोबल को तोड़ने का काम करेगा या विपक्षी एकता की नई जमीन मुहैया करा देगा। बेशक, बीजेपी की नई सरकार में दिख रही आक्रामकता के पीछे यही सोच है कि तृणमूल कांग्रेस खेमे में खौफ बढ़े और वहां से नेता-कार्यकर्ता जल्द से जल्द पक्ष बदलना शुरू कर दें, लेकिन राजनीति में ऐसी आक्रामकता हमेशा काम नहीं आती। अक्सर उसका उलटा प्रभाव भी देखने को मिलता है।
लड़ाई का जज्बा
शुरुआती संकेतों की बात करें तो खुद अभिषेक बनर्जी जिस तरह से हमले के बाद भी डटे रहे, हेलमेट पहनकर आगे बढ़े और कहा कि भले यहां से मेरी लाश निकले, लेकिन मैं मृत तृणमूल कार्यकर्ता के परिवार का साथ नहीं छोड़ूंगा, उसका अच्छा संदेश पार्टी समर्थकों के बीच गया है। लड़ाई के अपने जज्बे के लिए जानी जानेवाली ममता बनर्जी ने भी इस घटना को एक चुनौती के रूप में लेते हुए मंगलवार २ जून से ही सड़क पर उतरने का एलान कर दिया। शुरुआत कोलकाता में एक रैली से होगी।
तालमेल की कमी
खास बात यह भी है कि इंडिया ब्लॉक से जुड़े तमाम नेताओं ने तत्काल न केवल इस घटना का संज्ञान लिया, बल्कि तीखे शब्दों में इसकी भर्त्सना करते हुए एकजुटता का इजहार किया। वैसे इंडिया ब्लॉक में तालमेल की कमी शुरू से दिखती रही है। खुद तृणमूल नेतृत्व का इसके प्रति रुख भी सवालों के घेरे में रहा है। शायद इन्ही वजहों से पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव नतीजे घोषित होने के बाद कांग्रेस के कुछ नेताओं की शुरुआती प्रतिक्रिया में तृणमूल की हार पर संतोष जताया गया था। हालांकि, कांग्रेस नेतृत्व ने तत्काल दखल देते हुए पार्टीजनों को सचेत किया।
तमिलनाडु का मसला
बदले हालात में देखना होगा कि इंडिया ब्लॉक यहां से किस तरह के सबक लेता और वैâसे आगे बढ़ता है। छह जून को होनेवाली बैठक पर सबकी नजरें होंगी। चुनौतियां कम नहीं हैं। तमिलनाडु में भी काफी उलटफेर हुआ है। कांग्रेस ने जिस तरह से एक झटके में डीएमके का साथ छोड़कर टीवीके सरकार को समर्थन देने का पैâसला किया, उसका सहयोगी दलों में संदेश कुछ अच्छा नहीं गया है।
एकता की साझा जमीन
इतना तय है कि अब फोटो सेशन वाली एकता से काम नहीं बनेगा। इंडिया ब्लॉक के नेताओं को सड़क पर उतरकर जनता के बीच एकजुटता कायम करने की ओर आगे बढ़ना पड़ेगा। उन्हें अब जीने-मरने की लड़ाई लड़नी है। इस लड़ाई में दिखावे भर का साथ सबके लिए राजनीतिक मौत का पैगाम साबित हो सकता है। ऐसे में अगर विपक्षी खेमा चाहे तो अभिषेक बनर्जी पर हुआ हमला, उन सबके लिए एकता की साझा जमीन साबित हो सकता है।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)
