मुख्यपृष्ठस्तंभपूर्वांचल पॉलिटिक्स : १५० प्लस-गठबंधन की राह में सीटों का ‘यक्ष प्रश्न’

पूर्वांचल पॉलिटिक्स : १५० प्लस-गठबंधन की राह में सीटों का ‘यक्ष प्रश्न’

हिमांशु राज

उत्तर प्रदेश में २०२७ के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की तस्वीर साफ होने के बजाय धुंधली होती जा रही है। कांग्रेस जहां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर प्रक्रिया के विरोध में आंदोलन तेज किए हुए है, वहीं सपा के साथ सीट बंटवारे पर सहमति का इंतजार लंबा होता जा रहा है। लखनऊ में दोनों दलों का प्रदर्शन साझा नजर आया, लेकिन चुनावी जमीन पर सीटों का सवाल उनके बीच दूरी बढ़ा रहा है।
इसी बीच यूपी कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के बयान ने गठबंधन की राजनीति में नया मोड़ ला दिया है। मीडिया के सवाल पर उन्होंने कहा कि कांग्रेस १५० प्लस सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि पार्टी सभी ४०३ सीटों पर संगठन और उम्मीदवारों की तैयारी कर रही है। कांग्रेस के लिए यह केवल संख्या नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक हैसियत जताने का प्रयास है। कांग्रेस का तर्क है कि वह विपक्षी गठबंधन में बराबर की हिस्सेदार है और उसे सम्मानजनक भागीदारी मिलनी चाहिए। लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस के तालमेल से बने माहौल के बाद कांग्रेस अपने प्रभाव को मजबूत मान रही है। इसलिए १५० प्लस की मांग को अंतिम संख्या के बजाय बातचीत की शुरुआत में दबाव बनाने वाली रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी के लिए कांग्रेस की यह मांग आसानी से स्वीकार करना कठिन होगा। ४०३ सीटों वाले प्रदेश में सपा स्वयं सबसे बड़ी विपक्षी ताकत है। पार्टी की ओर से ३५० सीटों पर तैयारी का संकेत कांग्रेस की दावेदारी का सीधा जवाब माना जा रहा है। सपा गठबंधन चाहती है, लेकिन सीटों पर अपना निर्णायक नियंत्रण छोड़ने के लिए तैयार नहीं दिखती। सपा के लिए कांग्रेस की यह रणनीति असहज करने वाली है। उत्तर प्रदेश में सपा स्वयं विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत है और अखिलेश यादव गठबंधन में नेतृत्व की भूमिका बनाए रखना चाहते हैं। इसलिए सपा की ओर से सीटों की संख्या के बजाय जिताऊ उम्मीदवारों पर जोर दिया जा रहा है। अखिलेश यादव का संदेश साफ है कि केवल सीट मांगने से बात नहीं बनेगी, कांग्रेस को जीतने वाले उम्मीदवारों के नाम भी सामने रखने होंगे। वास्तविक विवाद केवल सीटों की संख्या का नहीं, बल्कि जीतने योग्य सीटों का है। कांग्रेस का दावा उन क्षेत्रों पर है, जहां उसे मुस्लिम, दलित, ब्राह्मण और शहरी मतदाताओं के बीच संभावनाएं दिखाई देती हैं। वहीं, सपा अपने पारंपरिक प्रभाव वाले क्षेत्रों को छोड़ना नहीं चाहेगी। दोनों दलों के नेता बयानबाजी के जरिए कार्यकर्ताओं को संदेश दे रहे हैं, लेकिन यही बयानबाजी बातचीत को कठिन बना रही है। राहुल गांधी और अखिलेश यादव के स्तर पर अंतिम सहमति की उम्मीद है, फिर भी जमीनी नेताओं के बयान दबाव बढ़ा रहे हैं। फिलहाल १५० प्लस का दावा कांग्रेस की अंतिम शर्त नहीं, बल्कि बातचीत की पहली बड़ी चाल दिखाई देता है।

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