मुख्यपृष्ठस्तंभतरकश : उत्तराखंड में जल-प्रलय... खोखले विकास का फूटा ढोल!

तरकश : उत्तराखंड में जल-प्रलय… खोखले विकास का फूटा ढोल!

प्रमोद भार्गव

केदारनाथ में २०१३ में आई प्राकृतिक आपदा के बाद अभी भी जारी है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले की खीर गंगा नदी और धराली में बादल फटने और हर्शिल के तेलगाड़ नाले में बाढ़ आने से बड़ी तबाही हुई है। इन प्राकृतिक आपदाओं को हमें प्रकृति से अंधाधुंड छेड़छाड़ के नतीजों के प्रतीक रूप में देखने की जरूरत है।
धराली में तो ५० से ज्यादा घर, ३० होटल और ३० होमस्टे मलबे में बदल गए। जो खीर नदी १० मी. चौड़ी थी, वह जल प्रवाह से ३९ मी. चौड़ी हो गई। अतएव जो भी सामने पड़ा उसे लीलती चली गई। प्रशासन चार लोगों की मौत और १०० से अधिक लोगों के लापता होना बता रहा है, लेकिन हिमालय के बीचों-बीच बसा खूबसूरत धराली गांव में सैलाब नीचे उतरते हुए दिखा, उससे लगता है कि मौतें कहीं अधिक हुई हैं। प्रलय इतनी तीव्रता से आया कि उसकी कान के पर्दे फाड़ देनेवाली गर्जना सुनने के बाद लोगों को बचने का समय ही नहीं मिल पाया। अब धराली मलबे में दफन हैं।
इस भूक्षेत्र के गर्भ में समाई प्राकृतिक संपदा के दोहन से उत्तराखंड विकास की अग्रिम पांत में आ खड़ा हुआ था, वह विकास भीतर से कितना खोखला था, यह इस क्षेत्र में निरंतर आ रही इस आपदाओं से पता चलता है। बरिश, बाढ़, भूस्खलन, बर्फ की चट्टानों का टूटना और बदलों का फटना, अनायास या संयोग नहीं है, बल्कि विकास के बहाने पर्यावरण विनाश की जो पृष्ठभूमि रची गई, उसका परिणाम है। तबाही के इस कहर से यह भी साफ हो गया है कि आजादी के इतने साल बाद भी हमारा न तो प्राकृतिक आपदा प्रबंधन प्राधिकरण आपदा से निपटने में सक्षम है और न ही मौसम विभाग आपदा की सटीक भविष्यवाणी करने में समर्थ हो पाया है। यह विभाग केरल और बंगाल की खाड़ी के मौसम का अनुमान लगाने का दावा तो करता है, किंतु भारत के सबसे ज्यादा संवेदनशील क्षेत्र हिमालय में बादल फटने की भी सटीक जानकारी नहीं दे पाता है। जबकि धराली क्षेत्र में एक साथ दो जगह बादल फटे और कुछ मिनटों में हुई तेज बारिश ने श्रीखंड पर्वत से निकली खीरगंगा नदी को प्रलय में बदलकर ९० प्रतिशत गांव को हिमालय के गर्भ में समा दिया।
विकास का लॉलीपॉप
बादल फटना अनायास जरूर है, लेकिन ये करीब १० किमी व्यास की परिधि में फटने के बाद अतिवृष्टि का कारण बनते हैं। १० सेंटीमीटर या उससे अधिक बारिश को बादल फटने की घटना के रूप में पारिभाषित किया जाता है। बादल फटने की घटना के दौरान किसी एक स्थान पर एक घंटे के भीतर, उस क्षेत्र में होनेवाली औसत, वार्षिक वर्षा की १० प्रतिशत से अधिक बारिश हो जाती है। मौसम विभाग वर्षा का पूर्वानुमान कई दिन या माह पहले लगा लेते हैं, लेकिन मौसम विज्ञानी बादल फटने जैसी बारिश का अनुमान नहीं लगा पाते। इस कारण बादल फटने की घटनाओं की भविष्यवाणी भी नहीं करते हैं।
समृद्धि, उन्नति और वैज्ञानिक उपलब्धियों का चरम छू लेने के बावजूद प्रकृति का प्रकोप धरा के किस हिस्से के गर्भ से फूट पड़ेगा या आसमान से टूट पड़ेगा, यह जानने में हम बौने ही हैं। भूकंप की तो भनक भी नहीं लगती। जाहिर है, इसे रोकने का एक ही उपाय है कि विकास की जल्दबाजी में पर्यावरण की अनदेखी न करें, लेकिन विडंबना है कि घरेलू विकास दर को बढ़ावा देने के मद्देनजर अधोसंरचना विकास के बहाने देशी-विदेशी पूंजी निवेश को बढ़ावा दिया जा रहा है। पर्यावरण संबधी स्वीकृतियों को राज्य सरकारें अब अनदेखा करने लगी हैं। इससे साबित होता है कि अंतत: हमारी वर्तमान अर्थव्यस्था का मजबूत आधार अटूट प्राकृतिक संपदा और खेती ही हैं। लेकिन उत्तराखंड हो या प्राकृतिक संपदा से भरपूर अन्य प्रदेश उद्योगपतियों की लॉबी जीडीपी और विकास दर के नाम पर पर्यावरण सबंधी कठोर नीतियों को लचीला बनाकर अपने हित साधने में लगी हैं। विकास का लॉलीपॉप प्रकृति से खिलवाड़ का कारण बना हुआ है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में आई इन तबाहियों का आकलन इसी परिप्रेक्ष्य में करने की जरूरत है।
उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश से विभाजित होकर ९ नवंबर २००० को अस्तिव में आया था। १३ जिलों में बंटे इस छोटे राज्य की जनसंख्या २०११ की जनगणना के अनुसार, १ करोड़ ११ लाख है। ८० फीसदी साक्षरता वाला यह प्रांत ५३,५६६ वर्ग किलोमीटर में पैâला है। उत्तराखंड में भागीरथी, अलकनंदा, गंगा और यमुना जैसी बड़ी और पवित्र मानी जानेवाली नादियों का उद्गम स्थल है। इन नदियों के उद्गम स्थलों और किनारों पर पुराणों में दर्ज अनेक धार्मिक व सास्ंकृतिक स्थल हैं इसलिए इसे धर्म-ग्रंथों में देवभूमि कहा गया है। यहां के वनाच्छादित पहाड़ अनूठी जैव विविधता के पर्याय हैं। तय है, उत्तराखंड प्राकृतिक संपदाओं का खजाना है। इसी बेशकीमती भंडार को सत्ताधारियों और उद्योगपतियों की नजर लग गई है, जिसकी वजह से प्रलय जैसे प्रकोप बार-बार इस देवभूमि में बर्बादी की आपदा बरसा रहे हैं।
तबाही की इबारत
उत्तराखंड की तबाही की इबारत टिहरी में गंगा नदी पर बने बड़े बांध के निर्माण के साथ ही लिख दी गई थी। नतीजतन, बड़ी संख्या में लोगों का पुश्तैनी ग्राम-कस्बों से विस्थापन तो हुआ ही, लाखों हेक्टेयर जंगल भी तबाह हो गए। बांध के निर्माण में विस्फोटकों के इस्तेमाल ने धरती के अंदरूनी पारिस्थिकीय तंत्र के ताने-बाने को खंडित कर दिया। विद्युत परियोजनाओं और सड़कों का जाल बिछाने के लिए भी धमाकों का अनवरत सिलसिला जारी रहा। अब यही काम रेल पथ के लिए सुरंगें बनाने में सामने आ रहा है। विस्फोटों से पैâले मलबे को भी नदियों और हिमालयी झीलों में ढहा दिया जाता है। नतीजतन, नदियों के तल मलबे से भर गए हैं। परिणामस्वरूप इनकी जलग्रहण क्षमता नष्ट हुई और जल प्रवाह बाधित हुआ। अतएव जब भी तेज बारिश आती है तो तुरंत बाढ़ में बदलकर विनाशलीला में तब्दील हो जाती है। बादल फटने के तो केदारनाथ और अब धराली जैसे परिणाम निकलते हैं। उत्तरकाशी, जोशीमठ में तो निरंतर बाढ़ और भू-स्खलन देखने में आ रहे हैं, इस क्षेत्र के सैकड़ों मकानों में भूमि धसकने से बड़ी-बड़ी दरारें आ गई हैं। भू-स्खलन के अलावा इन दरारों की वजह कालिंदी और असिगंगा नदियों पर निर्माणाधीन जलविद्युत और रेल परियोजनाएं भी रही हैं।
उत्तराखंड जब स्वंतत्र राज्य नहीं बना था, तब इस देवभूमि क्षेत्र में पेड़ काटने पर प्रतिबंध था। नदियों के तटों पर होटल नहीं बनाए जा सकते थे। यहां तक कि निजी आवास बनाने पर भी रोक थी। लेकिन उत्तर प्रदेश से अलग होने के साथ ही, केंद्र से बेहिसाब धनराशि मिलना शुरू हो गई। इसे ठिकाने लगाने के नजरिए से स्वयंभू ठेकेदार आगे आ गए।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार हैं।)

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