-चर्चा करोड़ों की, शिकायत शून्य
-चुनाव आयोग बना मूक दर्शक
सुनील ओसवाल / मुंबई
महाराष्ट्र विधान परिषद की चुनावी जंग इस बार वोटों से ज्यादा ‘वीआईपी ट्रीटमेंट’ और कथित महंगे गिफ्ट की चर्चाओं को लेकर सुर्खियों में है। चुनाव आयोग की निगरानी, आदर्श आचार संहिता और राजनीतिक शुचिता के दावों के बीच राज्यभर में एक सवाल तेजी से गूंज रहा है, क्या लोकतंत्र का यह चुनाव अब बंद कमरों में तय होने लगा है?
सैकड़ों मतदाताओं वाले इस चुनाव में हर वोट की कीमत इतनी बढ़ गई है कि पार्षद, नगरसेवक और जिला परिषद सदस्य अचानक सत्ता के केंद्र में आ गए हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जिन जनप्रतिनिधियों को सामान्य दिनों में कोई पूछता नहीं था, वे आज नेताओं के लिए ‘स्पेशल गेस्ट’ बन चुके हैं।
गोपनीय मुलाकातों का दौर
सड़कों पर चुनावी माहौल नहीं दिखता। न बड़ी सभाएं हैं, न रैलियों का शोर। लेकिन सत्ता के गलियारों में हलचल चरम पर है। होटल, रिसॉर्ट, निजी बैठकें और गोपनीय मुलाकातें इस चुनाव की नई पहचान बनती जा रही हैं।
सार्वजनिक रूप से पुष्टि नहीं
राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि कई क्षेत्रों में मतदाताओं को साधने के लिए हरसंभव कोशिश की जा रही है। महंगे गिफ्ट, विशेष सत्कार और व्यक्तिगत संपर्कों की चर्चा खुलेआम हो रही है। हालांकि, कोई भी पक्ष सार्वजनिक रूप से इन चर्चाओं की पुष्टि नहीं करता।
पूरा खेल सावधानी से
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जब चर्चा पूरे राज्य में हो और शिकायत शून्य हो तो यह स्थिति अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। क्या मतदाता शिकायत करने से बच रहे हैं या फिर पूरा खेल इतनी सावधानी से खेला जा रहा है कि कोई औपचारिक शिकायत सामने ही नहीं आ रही?
