-नेविल डिसूजा मैदान पर कन्वेंशन सेंटर, बच्चों के खेल की जमीन पर कंक्रीट का खतरा
सामना संवाददाता / मुंबई
जिस शहर में बच्चों को खेलने के लिए दो गज खुली जमीन मिलना मुश्किल है, वहां बांद्रा रिक्लेमेशन का नेविल डिसूजा फुटबॉल मैदान खेल के बजाय प्रदर्शनी और कन्वेंशन सेंटर के लिए इस्तेमाल करने की तैयारी हो रही है। सवाल सीधा है कि मुंबई के विकास का मतलब क्या हर खाली जमीन पर कंक्रीट खड़ा करना है या आनेवाली पीढ़ी के लिए कुछ मैदान और खुली हवा भी बचानी है?
बीएमसी की इम्प्रूवमेंट कमेटी इस प्रस्ताव को मंजूरी दे चुकी है और इसे १० अगस्त को नगर निकाय की सामान्य सभा के सामने रखा जाना था। प्रशासन का तर्क है कि मूल विकास योजना में इस जमीन का आरक्षण प्रदर्शनी केंद्र के लिए था, जबकि बाद में डेवलपमेंट प्लान-२०३४ में इसे खेल मैदान के रूप में दर्ज किया गया। अब पुराने आरक्षण को बहाल करने की कवायद चल रही है, लेकिन मुंबईकरों का सवाल इससे कहीं बड़ा है कि जब यह मैदान वर्षों से खेल गतिविधियों के लिए इस्तेमाल हो रहा था, तब अचानक इसे ‘गलत आरक्षण’ वैâसे माना जाने लगा?
मैदान नहीं, बच्चों का भविष्य है
मुंबई में जमीन की कीमत आसमान छू रही है। ऐसे में शहर की हर खुली जमीन पर निर्माण और विभिन्न परियोजनाओं की नजर रहती है। लेकिन मैदान महज जमीन का टुकड़ा नहीं होता। वह बच्चों के खेलने की जगह, खिलाड़ियों की पहली पाठशाला और शहर के लिए खुली सांस लेने की जगह होता है। आज फुटबॉल खेलनेवाले बच्चों से मैदान लेकर वहां कन्वेंशन सेंटर खड़ा करने की तैयारी है। कल किसी दूसरे खेल मैदान की जमीन पर किसी दूसरी परियोजना का दावा हो सकता है। उसके बाद पार्क और अन्य खुली जगहों की बारी आएगी। फिर सवाल उठेगा, आखिर मुंबई में बचेगा क्या?
विकास की कीमत बच्चे क्यों चुकाएं?
सरकार विकास की बात करती है। विकास होना भी चाहिए। लेकिन विकास की कीमत बच्चों के खेल के मैदान छीनकर क्यों वसूली जाए? यदि प्रदर्शनी केंद्र के लिए जमीन की जरूरत है तो प्रशासन को वैकल्पिक जमीन तलाशनी चाहिए। पहले से मौजूद खेल मैदान को खत्म करना शायद सबसे आसान रास्ता हो सकता है, लेकिन क्या यह मुंबई के भविष्य के लिए सबसे सही रास्ता भी है?
घोषणाओं में खेल, जमीन पर कंक्रीट!
यह मामला केवल बांद्रा के एक मैदान का नहीं है। यह मुंबई की विकास नीति का आईना है। एक तरफ युवाओं को खेलों में आगे बढ़ाने, खेल प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी तैयार करने की घोषणाएं होती हैं; दूसरी तरफ शहर में मौजूद खेल मैदानों की जमीन पर ही दूसरी परियोजनाओं की नजर है। घोषणाओं में खेल और जमीन पर कंक्रीट-आखिर यह वैâसा विकास मॉडल है? बच्चों को मोबाइल और स्क्रीन से दूर कर मैदान पर लाने की सलाह दी जाती है। लेकिन मैदान ही नहीं बचेंगे तो बच्चे खेलेंगे कहां? जिस देश में खिलाड़ियों से पदक की उम्मीद की जाती है, वहां स्थानीय खेल मैदानों की जमीन को प्रदर्शनी केंद्रों के लिए आरक्षित करने की कवायद निश्चित रूप से गंभीर सवाल खड़े करती है।
नगरसेवकों के सामने असली परीक्षा
जब यह प्रस्ताव नगर निकाय के सामने आए तो नगरसेवकों को केवल फाइलों और आरक्षण के पुराने इतिहास पर नजर नहीं डालनी चाहिए। उन्हें यह भी देखना होगा कि इस मैदान से कितने बच्चों, खिलाड़ियों और स्थानीय नागरिकों का भविष्य जुड़ा है।
मुंबई को विकास चाहिए, लेकिन ऐसा विकास नहीं जिसमें हर बार मैदान हार जाए और कंक्रीट जीत जाए।
बांद्रा का नेविल डिसूजा मैदान केवल मिट्टी और घास का टुकड़ा नहीं है। यह मुंबई के बच्चों के खेलने का अधिकार है। मैदान बचाइए, क्योंकि मैदान नहीं बचा तो आनेवाली पीढ़ी इमारतों के बीच तो बड़ी होगी, खेल के बीच नहीं।
