सुनील ओसवाल / मुंबई
विधान परिषद चुनाव से पहले महायुति के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। नासिक और जलगांव में जो कुछ हुआ, उसने भाजपा और शिंदे गुट के बीच बढ़ते अविश्वास और अंदरूनी संघर्ष को खुली सड़क पर ला खड़ा किया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि नासिक में भाजपा के बागी उम्मीदवारों ने शिंदे गुट के अधिकृत प्रत्याशी की मुश्किलें बढ़ार्इं तो जवाब में जलगांव में शिंदे गुट ने भाजपा के गढ़ में अपना ‘राजनीतिक हथियार’ उतार दिया।
नासिक की सीट समझौते के तहत शिंदे गुट को मिली। यहां नरेंद्र दराडे अधिकृत उम्मीदवार हैं। लेकिन भाजपा के गणेश गीते के भाई गोकुल गीते और प्रसाद हीरे ने नामांकन वापस लेने से साफ इनकार कर दिया। इससे शिंदे गुट नेतृत्व में भारी नाराजगी पैâल गई। पार्टी नेताओं का मानना है कि सहयोगी दल होने के बावजूद भाजपा ने अपने बागियों को रोकने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई।
इसी नाराजगी की गूंज जलगांव में सुनाई दी। भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार और गिरीश महाजन के करीबी नंदकिशोर महाजन के खिलाफ शिंदे गुट की नगरसेविका रेश्मा काले ने मैदान छोड़ने से इनकार कर दिया। इसके बाद राजनीतिक हलकों में यह संदेश तेजी से पैâल गया कि जलगांव में चल रही बगावत दरअसल नासिक का ‘राजनीतिक जवाब’ है। नामांकन वापसी के दिन दोनों जिलों में जो घटनाक्रम हुआ, उसने इस धारणा को और मजबूत कर दिया। नासिक में भाजपा के बागी उम्मीदवार आखिरी क्षण तक अड़े रहे, जबकि जलगांव में रेश्मा काले भी संपर्क से बाहर रहीं।
शिंदे गुट का साफ संदेश
सूत्रों का दावा है कि शिंदे गुट ने साफ संदेश दिया था कि यदि नासिक में भाजपा बागियों को नहीं हटाया गया, तो जलगांव में भी शिंदे गुट पीछे नहीं हटेगा। यही कारण है कि अंतिम समय तक दोनों सीटों पर राजनीतिक रस्साकशी जारी रही। सबसे ज्यादा चर्चा गिरीश महाजन और गुलाबराव पाटील की भूमिका को लेकर हो रही है।
