मुख्यपृष्ठसमाज-संस्कृतिएक साहित्य मनीषी के भाव, विचार और शब्द का सर्वोत्तम समन्वय ‘राघवचेतन...

एक साहित्य मनीषी के भाव, विचार और शब्द का सर्वोत्तम समन्वय ‘राघवचेतन राय रचना समग्र’

पुस्तक समीक्षा : राजेश विक्रांत
किसी साहित्यकार पर रचना समग्र का संचयन व संपादन बहुत परिश्रम का काम है, क्योंकि इसके जरिए उसकी रचनाधर्मिता के सभी पक्षों को सामने लाना होता है। साहित्यकार राघवचेतन राय का रचना-संसार अत्यंत व्यापक था। वे बहुमुखी प्रतिभा संपन्न व्यक्ति थे। उन्होंने गंभीर कविताओं का प्रणयन किया, कहानियां लिखीं, साक्षात्कार विधा में उनका दखल रहा, वैचारिक लेख लिखे, संपादन किया, संपादकीय लिखे तथा कविताओं का अनुवाद करने के साथ फुटकर लेखन भी किया। इन सबको एक जगह एकत्रित कर ग्रंथ के रूप में लाना एक बड़ा कार्य था, जिसे राघवचेतन राय की सहधर्मिणी, ख्यातिलब्ध साहित्यकार कुसुमलता सिंह ने कर दिखाया है। ५८२ पृष्ठों का यह ग्रंथ है ‘राघवचेतन राय रचना समग्र’, जिसका संपादन श्रीधर मिश्र ने किया। इसे लिटिल बर्ड पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है।
‘राघवचेतन राय रचना’ समग्र ९ खंडों में है। पहले खंड ‘कविताएं’ में उनके तीन कविता संग्रह- ‘वह गिरी बेचने वाला लड़का’, ‘वंचितों का निर्वाचन क्षेत्र’ व ‘बहनें अब घर में नहीं हैं’ की कुल ११५ कविताएं हैं। दूसरे खंड ‘कहानी’ में ७ कहानियां- कागज और अर्थ, इधर का दरवाजा उधर फेर के, गल्प जो सच है, नायक, मृतप्रसव, वैâद और साबका हैं। तीसरे खंड ‘लेख’ में ९ लेख- फिराक को सोचते हुए, सोल्झेनित्सिन को याद करते हुए कबीर का सत्य, कविता में जादू और व्याकरण, समकालीन समीक्षा की संक्रांति, शिक्षा माफिया, आम आदमी का अनजाना चेहरा, ‘निर्मल वर्मा की ग्यारह लंबी कहानियां’ पर टिप्पणी तथा शीशम संकट में हैं। चौथे खंड ‘पत्रिकाओं की संपादकीय’ के तहत १७ संपादकीय हैं। पांचवा खंड ‘साक्षात्कार’ में रचना तभी प्रभाव छोडती है जब वह रचनाकार के भीतर से उठती है तथा साहित्य का सहकारी आंदोलन ही उसे जन-मन तक ले जाएगा समाहित है। छठा खंड ‘स्वरचित कविताओं का अनुवाद’ है, जिसमें वयमध्य, इजहार, अंतर, अवनमन, गिरि पार्श्व, एक दरखत की शख्सीयत तथा टाइम एक्पोजर हैं। सातवां खंड ‘अनुवाद की गई कविताएं’ में सी.एच. सिसन और अन्य कवियों की कविताएं, निजार कब्बानी, जीवनानंद दास और देहबोध है। आठवां खंड ‘अनूदित पुस्तक की भूमिका’- भारत की बीसवीं सदी पीछे मुड़कर देखते हुए तथा नौवां खंड-‘ फुटकर रचना और पत्र’ में आख्यान-१, आख्यान-२, बाल कविताएं और पत्र सम्मिलित किए गए हैं।
बलिया के रतसड़ गांव के मूल निवासी राघवचेतन राय (१३ दिसंबर १९४४ २५ जनवरी २०१३) का जन्म पडरौना जिले में सरयू प्रसाद सिंह और रामा देवी के यहां हुआ था। उनका मूल नाम राघवेंद्र कुमार सिंह था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से १९५९-६३ में हिंदी में बी.ए. और अंग्रेजी साहित्य में एम. एम. की डिग्री हासिल करनेवाले राय ने आसाम के कई महाविद्यालयों में ५ वर्ष तक अंग्रेजी साहित्य का अध्यापन करनेवाले राय १९६८ में भारतीय राजस्व सेवा (आई आर एस) में चुन लिए गए। जहां से मुख्य आयकर आयुक्त दिल्ली और अध्यक्ष, आयकर समझौता आयोग दिल्ली से २००६ में सेवानिवृत्त हुए। संवेदनशील, मनन और गंभीर चिंतन वाले राघवचेतन राय की बचपन से ही साहित्य में अभिरूचि थी। कविता उनका जुनून था। उसके कुछ उदाहरण देखिए-
लक दक रात को / सोने से पहले/ वक्त और जीस्त के/ ताख पर रखे / मौके को मैंने आदतन / उठाकर/ उलट-पुलट कर देखा, वह मुस्कुराया मैंने संतोष की लंबी सांस ली और उसे फिर वहीं रख दिया / आने वाले कल के लिए / और लंबी तानकर सो गया। कविता (मौका)।
कविता / बचपन का खिलौना / जवानी का जोश/ बुढ़ौती का सोचना है। वह दौड़ती है / आशाओं के पीछे-पीछे / भागती नहीं है / दमतोड़ दु:खों से। प्रत्येक की अपनी कहानी नहीं / अपनी कविता होती है। मेरी / काले कंबल में / धवल वक्षस्थलों वाली / लहराती भीड़ से कतराती नकाबों वाली है। (कविता – एक)।
पौधा जब पेड़ बन जाता है / लड़का जब अधेड़ बन जाता है / भावना के रोमपात ऋतुओं में गिर जाते हैं / जीना यों काम हो जाता है / सपने काबूस बन जाते हैं / वक्त एक उबासी बन जाता है / प्रतिदिन उस्लूब रह जाता है।
(प्रगमन)।
राघवचेतन राय के अनुसार, ‘पीड़ा जब करीब से दिखती है। निर्दोष की जब प्रताड़ना होती है, कत्लेआम के जुनून में लोग जब दुनिया के किसी हलके में अनगिनत जुल्म ढाते हैं और मार खाने वाला कुछ कह नहीं पाता तो किसी संवेदनशील मन में इस निराशा के कठोर खालीपन की जगह सम्पूर्णता पाने के लिए कविता प्रस्फुटित होती है।’
राय ने प्रचुर मात्रा में तीखे तेवर वाली कविताएं लिखी। साथ ही अन्य साहित्यिक विधाओं में भी सृजन किया है। राघवचेतन राय ने अपनी समस्त रचनाओं में अपने समय की चेतना को सशक्त वाणी दी है। उनकी कहानियां तत्कालीन समाज के भोगे हुए यथार्थ का दर्पण हैं। उनके वैचारिक लेख मनुष्य को मनुष्यता का पाठ पढ़ाते हैं। राघवचेतन राय ने अपनी हिंदी कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया है, जो एकदम मौलिक लगता है। उन्होंने तमाम विदेशी एवं भारतीय भाषाओं के महत्वपूर्ण कवियों की कविताओं का अनुवाद किया है। प्रचुर संपादन के साथ उनका पत्र साहित्य भी है।
संपादक श्रीधर मिश्र के अनुसार, ‘राघवचेतन राय का रचना-संसार वस्तुत: उनके द्वारा मौलिक जगत् के समानांतर रचा गया उनका अपना प्रतिसंसार है इसीलिए रचनाकार को प्रजापति, विधाता व ब्रह्मा कहा गया है, क्योंकि वह भौतिक जगत के समानान्तर अपनी विधायिनी कल्पना शक्ति से एक आभासी प्रति संसार का सृजन करता है। वह अपने इस संसार का विधाता होता है। वह इसमें नागरिकता की शर्तें तय करता है, आचार संहिता नियत करता है व अपने इस प्रति संसार से भौतिक संसार की तुलना करते हुए भौतिक संसार को कुछ और सुंदर, कुछ और सुरक्षित बनाने का प्रस्ताव करता है।’
‘राघवचेतन राय रचना समग्र’ के लिए हिंदी साहित्य जगत संपादक श्रीधर मिश्र, संकलक कुसुमलता सिंह तथा प्रकाशक लिटिल बर्ड पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली का सदा सर्वदा ऋणी रहेगा। इसकी साज सज्जा आकर्षक है। मुख पृष्ठ व मुद्रण बेहतरीन है। इसका मूल्य ८५० रुपए है।

अन्य समाचार