मुख्यपृष्ठस्तंभराज की बात : राष्ट्रहित से विचारधारा का टकराव

राज की बात : राष्ट्रहित से विचारधारा का टकराव

 द्विजेंद्र तिवारी मुंबई

पिछले दिनों जब जोहरान ममदानी डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से न्यूयॉर्क के मेयर का चुनाव लड़ने का टिकट पा गए, पूरे अमेरिका में बवाल मच गया। जॉर्जिया की रिपब्लिकन प्रतिनिधि मार्जोरी टेलर ग्रीन ने बुर्का पहने हुए स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी की एक संपादित फोटो पोस्ट की, जो खूब वायरल हुई। सोशल मीडिया पर इस तरह की प्रतिक्रिया आने लगी कि जिस शहर पर ११ सितंबर २००१ को भीषण आतंकी हमला हुआ, उस शहर के लोग इसे वैâसे भूल सकते हैं। भारत में भी इसकी काफी प्रतिक्रिया हुई। एक प्रतिक्रिया यह थी कि कहीं मुंबई में भी ऐसा न हो जाए।
विचारों का कन्फ्यूजन
जोहरान ममदानी का विरोध अमेरिका में धर्मनिरपेक्षता, जायोनीवाद और राजनीतिक सक्रियता के इर्द-गिर्द एक गहरे वैचारिक टकराव को दर्शाता है। डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट ऑफ अमेरिका (डीएसए) के सदस्य जोहरान ममदानी फिलिस्तीनी अधिकारों के समर्थन में मुखर रहे हैं और उन्होंने इजरायल को अमेरिकी सैन्य सहायता की आलोचना की है। मध्य-पूर्व में बढ़े तनाव के बीच उनके इस रुख के कारण इजरायल समर्थक समूहों और मध्यमार्गी डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन नेताओं ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। आलोचकों का तर्क है कि ममदानी की बयानबाजी यहूदियों की सुरक्षा और इजरायल के लिए अमेरिकी समर्थन को कमजोर करती है। कुछ समूहों ने उनके रुख को ‘एंटी सेमिटिक’ (यहूदी विरोधी) भी करार दिया है, जिसके लिए अमेरिका में कठोर कानून हैं। हालांकि, ममदानी इस बात पर जोर देते हैं कि उनका विरोध नीतियों को लेकर है, न कि लोगों या धर्म को।
यह विरोध धर्मनिरपेक्ष, वामपंथी नेताओं के साथ एक बड़ी असहजता को भी दर्शाता है, जो राष्ट्रों की प्रमुख विदेश नीतियों को चुनौती देते हैं। डीएसए के अन्य लोगों की तरह ममदानी भी अपनी राजनीति को उपनिवेशवाद विरोधी और धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण से देखते हैं। उनका कहना है कि वे राष्ट्र या धर्म से परे मानवाधिकारों, विसैन्यीकरण और न्याय की वकालत करते हैं।
राष्ट्रहित का टकराव
यह समस्या दुनियाभर के मानवतावादी और सेक्युलर समूहों के सामने आती है। इससे कई बार राष्ट्रहित टकराते हैं और व्यक्ति को बड़ी आसानी से राष्ट्र विरोधी कह दिया जाता है। ईरान-इजरायल युद्ध के दौरान भारत में यही वैचारिक संकट नजर आया। ईरान में कट्टरपंथी इस्लामी सरकार है और बुर्का न पहनने पर महिलाओं को फांसी देने की खबरें सुनाई पड़ती हैं तो दूसरी तरफ सेकुलर लोकतांत्रिक देश अमेरिका है, जो ईरान के खिलाफ है तो किसी सेकुलर विचारधारा के व्यक्ति को किस तरफ होना चाहिए? इस प्रश्न के उत्तर में भारत में विचित्र विभाजन है। जो सेकुलर हैं, वे ईरान के समर्थन में हैं और हिंदुत्व समर्थक अमेरिका और इजरायल के पक्ष में नजर आ रहे हैं।
ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि किसी देश के नागरिक को किस तरह की राय अथवा विचार रखना चाहिए। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय संकट के इस दौर में उसे ईरान-इजरायल युद्ध में किसके साथ होना चाहिए? पहला विकल्प यह है कि उसे अपने देश की सरकार की राय के साथ होना चाहिए। दूसरा विकल्प यह है कि उसे अपनी धार्मिक भावनाओं के साथ होना चाहिए। तीसरा विकल्प यह है कि उसे अपनी अंतरात्मा की आवाज सुननी चाहिए। जोहरान के मामले में भी यही हो रहा है। अमेरिका की नीति इजरायल के समर्थन और ईरान के विरोध की है। बता दें कि यह नीति राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बनाई आज की नीति नहीं है। यह कई दशक से अमेरिका की विदेश नीति रही है। ईरान की इस्लामी क्रांति में वर्ष १९७९ में जब तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावासकर्मियों को एक वर्ष से ज्यादा समय तक बंधक बनाए रखा गया और कई लोग मारे गए, तब से ही अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए हुए हैं।
नागरिक कर्तव्य
तो ऐसे में जोहरान जैसे धार्मिक अल्पसंख्यक अमेरिकी नागरिकों का क्या कर्तव्य होना चाहिए? क्या उन्हें अपने देश की विदेश नीति का समर्थन करना चाहिए? क्या उन्हें अपनी धार्मिक पहचान के साथ जुड़ते हुए ईरान का समर्थन करना चाहिए? या उन्हें अंतरात्मा की आवाज सुननी चाहिए?
इन तीनों विकल्पों में से पहला विकल्प जोहरान पर लागू नहीं होता, क्योंकि उनके विरोधियों का आरोप है कि वह दूसरे विकल्प को चुन रहे हैं, जबकि जोहरान का कहना है कि वह तीसरे विकल्प को लेकर चल रहे हैं।
निष्कर्षत: यह अमेरिका का अंदरूनी मामला है और दस हजार मील दूर बैठकर यहां भारत से हम मशविरा नहीं दे सकते कि अमेरिकी नागरिकों के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा है। मेयर पद के लिए जोहरान को वोट देना चाहिए या नहीं? लेकिन इससे यह सबक हम जरूर ले सकते हैं कि जब ईरान-इजरायल संघर्ष में भारत सरकार की विदेश नीति चकरघिन्नी की तरह घूम रही हो तो हमें तीन में से कौन सा विकल्प चुनना चाहिए।
(लेखक कई पत्र पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं और राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)

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