एड. दरम्यान सिंह बिष्ट
आज मन बहुत भारी है। अखबार के पन्नों पर गोरेगांव के एनईएससीओ कॉम्प्लेक्स में हुए उस म्यूजिक कॉन्सर्ट की खबर पढ़कर रूह कांप गई। जिसे लोग मनोरंजन और कला का मंच समझ रहे थे, वह दो युवाओं के लिए मौत का अड्डा बन गया। टेक्नो बैंड र्९े९ के परफॉर्मेंस के दौरान नशे के ओवरडोज से हुई उन दो मौतों ने समाज के उस काले सच को उजागर कर दिया है, जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं।
हैरानी इस बात की है कि जिस कार्यक्रम में ५,००० के करीब युवा मौजूद थे, वहां खुलेआम ड्रग्स और शराब का तांडव वैâसे चलता रहा? क्या हमारी पुलिस और प्रशासन वाकई इतने बेखबर थे? विपक्ष का यह सवाल मुझे भी कचोट रहा है कि क्या हमारी सुरक्षा एजेंसियां सिर्फ वसूली और हफ्ता कलेक्शन तक सीमित हो गई हैं? जब मासूमों की जान चली गई, तब जाकर प्रशासन की नींद खुली और अब कार्रवाई का दिखावा किया जा रहा है।
यह केवल एक कॉन्सर्ट की बात नहीं है। खबर में जिस तरह नासिक, संभाजीनगर और सोलापुर जैसे शहरों का जिक्र है, उससे साफ है कि पूरे महाराष्ट्र में नशे का जाल पैâल चुका है। यह सोचना भी डरावना है कि हमारी युवा पीढ़ी किस दिशा में जा रही है।
आज की व्यवस्था को देखकर ऐसा लगता है जैसे सत्ता के गलियारों में बैठे लोग इन गुनहगारों को संरक्षण दे रहे हैं। अगर गृह विभाग और पुलिस अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाती तो शायद आज यह नौबत न आती। क्या वाकई आम आदमी की जान की कोई कीमत नहीं रह गई है?
आज डायरी लिखते हुए बस यही प्रार्थना है कि प्रशासन अपनी नींद से जागे और केवल छोटे प्यादों को नहीं, बल्कि उन बड़े मगरमच्छों को पकड़े जो युवाओं की जिंदगी से खेल रहे हैं। अब सोने की कोशिश करता हूं, पर उन दो युवाओं के चेहरों का ख्याल मन से नहीं जा रहा।
