मुख्यपृष्ठस्तंभरिपोर्टर डायरी : ‘जंजीर’ से जंजीर तक मुंबई की अंडरवर्ल्ड स्टोरी

रिपोर्टर डायरी : ‘जंजीर’ से जंजीर तक मुंबई की अंडरवर्ल्ड स्टोरी

सुनील ओसवाल

`जंजीर’ के पर्दे से लेकर मुंबई की गली तक-दिलावर खान का किरदार, करीम लाला की पर्सनैलिटी और अंडरवर्ल्ड का माहौल-सब एक-दूसरे में घुला हुआ है। धुआं, बारिश, गनफायर, कहवा, हुक्का और डर सबका मेल मुंबई की गलियों की कहानी कहता है।
`मुंबई का अंधेरा और बारिश की गंध और बड़े पर्दे पर ‘जंजीर’ का सीन। अमिताभ बच्चन की आंखों में वही कड़वाहट और तेज, जो उनके असली संघर्ष से निकली थी। पहले कई छोटी-छोटी फिल्मों में एक लीड एक्टर के तौर पर दबे रह गए थे, लेकिन प्रकाश मेहरा की ‘जंजीर’ ने उनकी पैडल एक्टर की पहचान को सुपरस्टार बनने में बदल दिया।
फिल्म में जो दिलावर खान का किरदार था, उसे सलीम जावेद ने इस अंदाज में बनाया कि लगता था जैसे करीम लाला खुद स्क्रीन पर उतर आए हों। यही वह रियल गैंगस्टर था, जिसने मुंबई के पठानों को अपनी छत्रछाया में लिया। मुंबई की गलियों में करीम लाला का नाम बसता था। अयूब लाला ने पठानों की लीडरशिप छोड़ दी थी और उसी रात करीम लाला १४,००० पठानों का सरदार बन गया। धीरे-धीरे वह पठान गैंग का असली सरदार बन गया। तब मुंबई में कावा का जलवा था। खसखस, सौंफ, चीनी और जड़ी-बूटियों का मिश्रण। मजदूर वर्ग के लिए सिर्फ चार आने का छोटा गिलास और वो नशा लगता था, जैसे हर एक कावा उनके भीतर ताकत भर दे। यही काम करीम लाला ने किया। हुक्का और कावा पार्लर खोले, हर गली में अपनी पकड़ बनाई। हुक्का पार्लर सिर्फ धुआं ही नहीं छोड़ते थे, बल्कि डर और वर्चस्व का संदेश भी देते थे। करीम लाला लंबा, साढ़े छह फीट, ग्रे आंखों वाला आदमी। उसके राजनीतिक कनेक्शन दिल्ली तक पैâले हुए थे। ड्रग्स का धंधा, हत्यारों की भर्ती और गैंग्स के बीच झगड़े-करीम लाला सब कुछ कंट्रोल करता था, लेकिन ये कहानी सिर्फ शक्ति और क्राइम की नहीं थी। करीम लाला के परिवार की भी कहानी थी। उसका भाई रहीम लाला और उसके बेटे-समद और मलाड। दुश्मनों ने उनके परिवार को नष्ट किया। मलाड खान एक पुलिस एनकाउंटर में मारा गया, रहीम भी गोलियों का शिकार हुआ। करीम लाला अकेला रह गया, बुढ़ापे, अस्थमा और अंधेपन के साथ।
मुंबई के नए गैंगस्टर उसे समझ नहीं पाते थे। वे पीछे से गोली चलाते थे, मशीनगनों की आवाज में खुद को मर्दाना समझते थे। करीम लाला के लिए असली मर्दाना खेल था-सीधे आमने-सामने की लड़ाई, तलवार और चाकू की लड़ाई। यही वजह थी कि उसे पुराने समय के अंडरवर्ल्ड में सुकून था। फिल्मों ने उसकी क्राइम लाइफ को बॉलीवुड के पर्दे पर उतारा, लेकिन असली करीम लाला का असली चरित्र अलग था। निर्दय, लेकिन कभी-कभी मासूमों के सामने नरम। जब उसके निशाने पर कोई होता और सामने उसके बच्चों की मासूम आंखें दिखतीं, तो उसकी हाथ की ताकत बदल जाती थी। जंजीर की स्क्रीन से लेकर मुंबई की गलियों तक, दिलावर खान का किरदार, करीम लाला की पर्सनैलिटी और मुंबई का अंडरवर्ल्ड-सब एक-दूसरे में बंधे हुए हैं। शक्ति, डर, पैसा और इंसानियत का यह सफर आज भी याद किया जाता है।

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