मुख्यपृष्ठनए समाचारहेल्थकेयर कर्मचारियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बने-अतुल ग्रोवर

हेल्थकेयर कर्मचारियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बने-अतुल ग्रोवर

सामना संवाददाता / मुंबई

भारत का हेल्थकेयर सिस्टम 1.4 बिलियन से अधिक लोगों की विशाल आबादी को अपनी सेवाएं प्रदान करता है, ऐसे में यह दुनिया के सबसे बड़े और सबसे जटिल हेल्थकेयर सिस्टम्स में से एक है। अतुल ग्रोवर (एसोचैम चेयरमैन, मैडटेक काउन्सिल और मैनेजिंग डायरेक्टर, बीडी इंडिया) ने कहा कि आज स्वास्थ्य सेवा संस्थान अपने हेल्थकेयर कर्मचारियों की व्यवसायिक सुरक्षा को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं, क्योंकि ये कर्मचारी ही हेल्थकेयर सिस्टम की रीढ़ हैं और उन्हें काम के दौरान कई तरह के खतरों का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए वे काम के दौरान रक्त से फैलने वाले संक्रमण जैसे ह्यूमन इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस (एचआईवी), हेपेटाइटिस सी वायरस (एचसीवी) और हेपेटाइटिस बी वायरस (एचबीवी) के साथ-साथ साइटोटॉक्सिक दवाओं के संपर्क में भी आ सकते हैं।
अस्पताल में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए खतरे की बात करें तो सूई चुभने से लगने वाली चोट (नीडल स्टिक इंजरी-एनएसआई) सबसे बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि ऐसा होने पर रक्त से फैलने वाले संक्रमण की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती है।
अगर इस समस्या का समाधान नहीं किया जाए तो यह कई तरह से नुकसान का कारण बन सकती है, जैसे इलाज का भारी खर्च, कर्मचारी का काम से अनुपस्थित होना और कभी-कभी कर्मचारी का नौकरी छोड़ देना। भारत में नर्सों की संख्या प्रति 1000 की आबादी पर 1.7 है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार यह संख्या प्रति 1000 आबादी पर 3 होनी चाहिए। ऐसे में नर्सों की सुरक्षा के लिए सक्रिय दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। हमें सुरक्षा के लिए ऐसा दृष्टिकोण अपनाना होगा, जो मैकेनिकल, केमिकल और सिस्टम से जुड़े जोखिमों का एक साथ समाधान कर सके।
समस्या का पैमाना
भारत में अस्पतालों पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि एनएसआई की समस्या आम है। हर वर्ष लगभग 30 से 60 प्रतिशत हेल्थकेयर कर्मचारी इसका शिकार होते हैं। हालांकि ऐसे बहुत कम मामलों की रिपोर्ट दर्ज होती है, जिससे यह कार्यस्थल की सुरक्षा से जुड़ी एक गंभीर लेकिन रोकी जा सकने वाली समस्या बन जाती है। आईसीएमआर की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल एनएसआई के लगभग 20,000 मामले सामने आते हैं।
हेल्थकेयर कर्मचारियों के लिए नीडल स्टिक इंजरी सबसे आम व्यावसायिक खतरों में से एक है। अध्ययनों के अनुसार लखनऊ के एक अस्पताल में एक वर्ष के भीतर 11.7 प्रतिशत हेल्थकेयर कर्मचारियों को एनएसआई का सामना करना पड़ा, जबकि दिल्ली में 79.5 प्रतिशत कर्मचारियों ने बताया कि उन्हें अपने करियर में कम-से-कम एक बार इसका सामना करना पड़ा। दुनिया भर में इसकी औसत दर लगभग 44.5 प्रतिशत है।
ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट न किया जाना भी एक गंभीर समस्या है। केवल 30 से 70 प्रतिशत मामलों की ही रिपोर्ट दर्ज होती है, जिसके कारण बड़ी संख्या में मामलों में आवश्यक कार्रवाई नहीं हो पाती।
डिवाइस और संक्रमण से जुड़े जोखिम
एक टर्शियरी केयर सेंटर में किए गए अध्ययन में पाया गया कि नीडल स्टिक इंजरी के सबसे अधिक मामले ब्लड सैंपल लेने (42.86 प्रतिशत) के दौरान होते हैं। इसके बाद आईवी कैनुलेशन (36.90 प्रतिशत) और सर्जिकल प्रक्रियाओं (13.09 प्रतिशत) के दौरान ऐसे मामले सामने आते हैं। इस्तेमाल के बाद नीडल डिटैचमेंट के दौरान यह आंकड़ा 7.14 प्रतिशत है।
एनएसआई के अधिकतर मामले सर्जिकल प्रक्रिया के बजाय मरीज के बिस्तर के पास की जाने वाली सामान्य प्रक्रियाओं के दौरान होते हैं। इस तरह की चोट से एचआईवी (0.3 प्रतिशत), हेपेटाइटिस सी (1.8 प्रतिशत) और हेपेटाइटिस बी (6 से 30 प्रतिशत, जिनका टीकाकरण नहीं हुआ है) के संक्रमण का खतरा रहता है। एचबीवी के खिलाफ टीकाकरण से 95 प्रतिशत से अधिक सुरक्षा मिलती है, फिर भी समय पर इलाज बेहद जरूरी है। इसमें एचआईवी के लिए 72 घंटे के भीतर पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (पीईपी) शुरू करना शामिल है।
सुरक्षा उपकरण अपनाने की जरूरत
सेफ्टी-इंजीनियर्ड डिवाइसेज ऐसी चोटों को कम करने में प्रभावी साबित हुए हैं और दुनिया भर में इनके उपयोग की सिफारिश की जाती है। इसके बावजूद लागत और नियामकीय चुनौतियों के कारण भारत में इनका उपयोग अभी व्यापक स्तर पर नहीं हो पाया है। जागरूकता की कमी, इलाज में देरी, सामाजिक भ्रांतियों और रिपोर्टिंग न होने के कारण केवल 68 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मियों को ही चोट लगने के बाद पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस मिल पाती है।
भारत में नर्सों का अनुपात डब्ल्यूएचओ के मानकों से कम है और 30 से 50 प्रतिशत प्रशिक्षित नर्सें विदेश चली जाती हैं। लंबी शिफ्ट और थकान के कारण चोट लगने का खतरा बढ़ जाता है। 58 प्रतिशत कर्मचारी स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं, जबकि 63 प्रतिशत का कहना है कि मौजूदा सुरक्षा नियम पर्याप्त नहीं हैं।
रोकथाम के उपाय
चिकित्सकीय अध्ययनों से स्पष्ट है कि सेफ्टी-इंजीनियर्ड डिवाइसेज एनएसआई के लगभग दो-तिहाई मामलों को रोक सकते हैं, विशेष रूप से आईवी सेफ्टी टेक्नोलॉजी में इसका सबसे अधिक लाभ देखा गया है।
एनएसआई से बचाव के लिए सेफ्टी-इंजीनियर्ड डिवाइसों का उपयोग, सुरक्षित कार्यप्रणाली (जैसे सुई पर दोबारा कैप न लगाना और तुरंत सुरक्षित तरीके से निस्तारण करना), प्रभावी प्रशिक्षण, रिपोर्टिंग सिस्टम, पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीई) का नियमित उपयोग, टीकाकरण और चोट लगने के बाद तत्काल उपचार सुनिश्चित करना आवश्यक है।
हेपेटाइटिस-बी के सार्वभौमिक टीकाकरण को मजबूत बनाना, पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस की 24×7 उपलब्धता सुनिश्चित करना तथा अनुकूल रिपोर्टिंग सिस्टम विकसित करना भी जरूरी है, क्योंकि भारत के हेल्थकेयर सिस्टम को मजबूत बनाने के लिए हेल्थकेयर कर्मचारियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
निष्कर्ष
अतुल ग्रोवर ने कहा कि हेल्थकेयर कर्मचारियों की सुरक्षा और मरीजों की बेहतर देखभाल सुनिश्चित करने के लिए सही प्रशिक्षण, पीपीई की उपलब्धता, संक्रमण नियंत्रण के उपायों का पालन, सेफ्टी-इंजीनियर्ड डिवाइसों का उपयोग और संस्थागत स्तर पर मजबूत सुरक्षा नीतियां लागू करना अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि भारत का हेल्थकेयर सिस्टम तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में हेल्थकेयर कर्मचारियों को काम के दौरान होने वाली रोकी जा सकने वाली चोटों से बचाना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। सेफ्टी-इंजीनियर्ड डिवाइसेज में निवेश, वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित उपायों को लागू करना और कर्मचारियों के कल्याण को प्राथमिकता देना मजबूत एवं सुरक्षित हेल्थकेयर सिस्टम के निर्माण के लिए अनिवार्य है।

अन्य समाचार