-डाॅ. रवीन्द्र कुमार
खबर आई है कि मुंबई-मेट्रो के एक स्टेशन गुंडावलि पर एक बिल्ली बड़े अरसे से आते-जाते यात्रियों को अपनी पैनी नज़र से देखती, परखा करती थी। वह बिला नागा अपनी ड्यूटी पर आ जाती थी और अपना निर्धारित स्थान ग्रहण कर अपनी ड्यूटी पर लग जाती थी। यात्री उस से और वह यात्रियों से भलीभाँति परिचित थे। वे अपनी-अपनी भाषा में एक दूसरे का अभिवादन कर ‘प्लेज्नट्रीज़’ भी एक्सचेंज करते थे। अच्छा खुशनुमा माहौल रहता था। मुंबई में बिल्लियों का विशेष स्थान है। वे स्नेह की पात्र होती हैं। बहुत तादाद में लोग उन्हें पालते हैं। उनसे लाड़ लड़ाते हैं। हालांकि बिल्ली बहुत ‘डिमांडिंग’ होती हैं, खासकर ‘डॉगी’ बिरादरान के मुक़ाबले। एक कहावत भी है ना : ‘जब आप अपने पालतू डॉगी की आवभगत करते हैं तो वह मन ही मन कहता है मेरा मालिक मेरे लिए भगवान है। जब आप अपनी पालतू बिल्ली की आवभगत करते हैं तो वह मन ही मन कहती है अपुन हीच भगवान है’। मुंबई प्रवास के दौरान कोलाबा में मेरे आस-पड़ोस में बाकायदा लोग-बाग बिल्लियों को खाना खिलाते थे। एक भद्र दयालु महिला तो बिल्लियों को भोजन देने सुबह तड़के ही निकल पड़ती थी। बिल्लियाँ उसकी प्रतीक्षा करती थीं, एक बार उन ‘मैडम’ से बात हुई तो मैंने नोट किया उनकी अपनी आँखें बिल्ली की तरह ग्रीन, स्थिर, ठंडी और एक हद तक डरावनी सी थीं। फिल्मों में भी बिल्ली का खूब महिमामंडन किया गया है। अक्सर हीरो, हीरोइन अथवा बॉस बिल्ली से खेलता दिखाया जाता, फिल्मों के टाइटल भी ‘ब्लैक कैट’ जैसे होते हैं।
मुंबई में ये बिल्ली पालने का शौक शायद अंग्रेजों से आया होगा। जब मेट्रो के यात्रियों को गुंडावलि स्टेशन पर बिल्ली दिखाई नहीं दी तो उन्होने पूछताछ की और मेट्रो के अधिकारियों से अनुरोध किया कि अब उनको इस बिल्ली की इतनी आदत पड़ गई है। अब उसे कृपया भगाया न जाये। मुंबई मेट्रो के अधिकारीगण, यात्रियों से भी चार कदम आगे निकले। उन्होने बिल्ली को ‘अपाॅइंट’ ही कर लिया और उसे भन्नाट पदनाम (डेजिंग्नेशन) भी दे दिया -चीफ फ्लाईन ऑफिसर, बोले तो सी.एफ.ओ. । बिल्ली भी खूब खुश होगी। आज के इस ‘संविदा’ और ‘अग्निवीर’ के दौर में सीधे चीफ की पोस्ट। वाओ! वाओ! नो! नो! म्याऊँ!म्याऊँ! मुंबई के मेरे ऑफिस में बहुत बिल्लियाँ थीं। मुझे बताया गया कि ये पीढ़ियों से यहाँ हैं इनके ग्रेट ग्रेट ग्रेट ग्रांड फादर भी यहीं के डोमिसाइल थे। पता लगा कि फाइलों को चूहे कुतर जाते थे अतः अंग्रेजों के ज़माने से ऑफिस में बिल्लियाँ पाले जाने लगीं। उनके दूध-बिस्किट के लिए ऑफिस सुपरिटेंडेंट के पास एक ‘इम्प्रेस्ट’ भी होता था। अब जब चहुं ओर बिल्लियों का राज हो तो चूहे क्या खा कर फाइल खाएँगे।
ये बंद अलमीरा और फिर उसके बाद डिजिटल रिकॉर्ड होने पर बिल्लियों की लापरवाही होने लगी। कभी हृष्ट-पुष्ट बिल्लियाँ कॉरीडोर में चहलकदमी करती थीं। अब बिल्ली इतनी मरगिल्ली हो गयीं कि युवा बिल्लियाँ भी बूढ़ी लगने लग पड़ी हैं। हो सकता है वो भी आज के दौर के अनुसार स्लिम-ट्रिम रहना पसंद करती हों। यूं भी अब उनके लिये दूध कौन लाये, कहाँ से लाये। यहाँ आदमी को तो दूध नसीब है नहीं। बेचारों को केमिकल मिला नकली दूध, नकली चाय में डाल के पीना पड़ रहा है। गुंडावलि की बिल्ली निश्चय ही तक़दीर वाली है। वरना आदमी लोग को सी.एफ.ओ. क्या? कोई संविदा या ठेके पर लेने वाला भी नहीं। वक़्त है अब बिल्ली दो-चार लोगों के परिवार को पाल ले। आखिर हमारी दिल्ली में लंगूर लोग अपने ‘मालिक’ के परिवार का पेट पाल ही रहे हैं।
नोट: अभी इस बात की अधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है ये गुंडावलि स्टेशन पर मांजली (बिल्ली) है अथवा बोका (बिलौटा)
