मुझको मुझसे मिले हुए, एक जमाना बीत गया,
सागर मन में जो था भरा, जाने कब का रीत गया।
नयन बावरे देखें बाहर, भीतर का कोई ध्यान नहीं,
झूठा दंभ, अहंकार झूठा, सच का कोई ज्ञान नहीं।
मन से मन के महायुद्ध में, जाने धन कब जीत गया,
सागर मन में जो था भरा, जाने कब का रीत गया।
मतलब की भरी भीड़ में, मन का कोई मीत नहीं,
देख-दिखावे के मेले में, मिलती सच्ची प्रीत नहीं।
हार गया मैं खुद से ही, जग से जब मैं जीत गया।
सागर मन में जो था भरा, जाने कब का रीत गया।
रहा भटकता दुनिया में और खुद से ही अनजान रहा,
कदम-कदम पर खाई ठोकर, पल-पल मैं परेशान रहा।
उस सच से क्या उम्मीद करूँ, झूठ जिसे खरीद गया।
सागर मन में जो था भरा, जाने कब का रीत गया।
अब तो मन के सूने पथ पर, खुद से मिलना बाकी है,
झूठे सारे आवरणों से, बाहर निकलना बाकी है।
अंतर्मन के इस सफर का, राह मुझको दीख गया,
सागर मन में जो था भरा, जाने कब का रीत गया।
बलदेव राज भारतीय
असगरपुर (यमुनानगर)
हरियाणा
