मुख्यपृष्ठस्तंभसंस्मरण: दिल्ली का पोलो ग्राउंड

संस्मरण: दिल्ली का पोलो ग्राउंड

-डॉ. रवीन्द्र कुमार

फाइनली दिल्ली के जयपुर पोलो ग्राउंड का पटाक्षेप हो गया। खबर यह है कि उसे सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के कारणों से सील कर दिया गया है। यह पोलो ग्राउंड, ऐसा समझिए, सफदरजंग मकबरे से शुरू होकर आगे प्रधानमंत्री के पूर्व आवास 7 रेसकोर्स रोड (नया नाम- लोक कल्याण मार्ग) तक जाता है। रेस के सीजन में आप कार से लेकर फोर-सीटर तक खड़े देख सकते थे। यहां सर्विसेज का एक टॉकीज भी था, रेसकोर्स नाम से। मैंने वहां कई फिल्में देखी थीं। टिकटों के रेट अन्य टॉकीज के मुकाबले कम होते थे। वहां रविवार को तंबोला (हाउसी) भी हुआ करती थी। ऐसी खुली-खुली जगहों और हरियाली के लिए नया नाम है, शहर के फेफड़े (लंग्स)। जयपुर नाम शायद इसलिए पड़ा होगा कि एक तो जयपुर नरेश स्वयं पोलो के शौकीन थे। उनका देहांत भी पोलो खेलते हुए हुआ था। पोलो ग्राउंड की यह जमीन जयपुर नरेश की थी और उन्होंने ही दी थी। यूं यह भी बताते हैं कि दिल्ली, खासकर लुटियंस दिल्ली की ज्यादातर जमीन का मालिकाना हक जयपुर राजघराने के पास था। उसी का परिणाम था कि राष्ट्रपति भवन के प्रांगण (फोरकोर्ट) में एक पिलर, जयपुर पिलर के नाम से, बीचों-बीच गड़ा है।
नेहरू जी अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान तीन मूर्ति में रहे। यह एक शानदार भवन है, बिल्कुल प्रधानमंत्री की गरिमा के अनुकूल। मगर जब इसे संग्रहालय बनाने का निर्णय ले लिया गया तो अगले प्रधानमंत्री के लिए दूसरे स्थान की तलाश लाजिमी थी। यूं इंग्लैंड में 10 डाउनिंग स्ट्रीट सैकड़ों सालों से प्रधानमंत्री का अधिकृत राजकीय आवास है। जब 10 जनपथ रोड पर लालबहादुर शास्त्री जी बतौर प्रधानमंत्री रहा करते थे, तब हमारी स्कूल जाने वाली बस को उनके आवास से न निकालकर रूट बदल दिया गया था। अब बस, जो है सो, निर्माण भवन, उद्योग भवन की तरफ मुड़कर फिर मोतीलाल नेहरू रोड लेकर वापस जनपथ के राउंडअबाउट पर आ जाती थी। मेरे खयाल से सुरक्षा और शोर, दोनों की वजह से ऐसा किया गया होगा। कालांतर में शास्त्री जी की अकस्मात मृत्यु के उपरांत बगल की कोठी में ही उनके नाम का एक संग्रहालय खुल गया, जहां उनकी यादगार चीजें संजोकर रखी गई हैं। पहले उनके परिवार के सदस्य भी वहां रहा करते थे। अब का पता नहीं।
यह जो म्यूजियम बनाने का रिवाज है, यह हमारे देश में दिवंगतों के प्रति आदर और उनकी स्मृति को सम्मान देने का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि चाहे तीन मूर्ति हो, या 10 जनपथ, या फिर 1 सफदरजंग रोड (इंदिरा गांधी), सभी संग्रहालय बन गए हैं। 7 रेसकोर्स रोड, जो एक-दो बंगलों से शुरू होते-होते, आज पूरी की पूरी लेन प्रधानमंत्री आवास का हिस्सा हो गई। कहीं आगंतुकों से मुलाकात, कहीं मीटिंग रूम आदि-आदि। अब लेटेस्ट यह है कि प्रधानमंत्री आवास वहां से भी शिफ्ट होकर राष्ट्रपति भवन के आसपास कहीं आ गया है।
जब इंदिरा जी 1 सफदरजंग रोड में रहती थीं, तब बगल की एक कोठी बतौर ऑफिस ले ली गई थी। यूं उनके आवास के ठीक सामने दिल्ली जिमखाना क्लब अपनी स्थापना से रहा है, बोले तो ‘पीसफुल को-एक्जिस्टेंस’। अब सुना है, उन्हें भी अपना टीन-टब्बर उठाने को कह दिया गया है। इसी श्रृंखला में दिल्ली फ्लाइंग क्लब, दिल्ली ग्लाइडिंग क्लब पहले ही जा चुके हैं, अर्थात खाली कराए जा चुके हैं। आपातकाल के दौरान हमारा ग्लाइडिंग रूट बदल दिया गया था और पीएम आवास की तरफ जाना सर्वथा वर्जित कर दिया गया था।
सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के ‘परसेप्शन’ समय के साथ बदलते रहते हैं। दिल्ली दररोज बदल रही है। नई-नई इमारतें बन रही हैं। आप जब, जहां निकल जाओ, कुछ न कुछ बन रहा होता है या तोड़ा जा रहा होता है। ‘ओल्ड ऑर्डर चेंजेज, गिविंग वे टू न्यू।’ कभी दिल्ली के गांवों को विस्थापित कर लुटियंस दिल्ली बनाई गई थी। मुझे तो कई बार ऐसा लगता है, जैसे उन 450 गांवों के मूल ग्रामीणों का श्राप दिल्ली को लगा हुआ है। कोई ‘स्टेबिलिटी’ नहीं। पता नहीं ‘हैपीनेस इंडेक्स’ पर दिल्ली वाले किस नंबर पर आते होंगे। गमन फिल्म में शहरयार जी का लिखा और सुरेश वाडकर का गाया गीत याद है—
सीने में जलन, आंखों में तूफान-सा क्यूं है
इस शहर में हर शख्स परेशान-सा क्यूं है

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