-विचारधारा बेचकर नहीं होती सेवा
-जिनमें निष्ठा नहीं, वही स्वार्थ के लिए बदलते हैं दल
सुनील ओसवाल / मुंबई
महाराष्ट्र की राजनीति में उस समय भूचाल आ गया, जब वरिष्ठ समाजसेवी अन्ना हजारे ने शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर एकनाथ शिंदे गुट में शामिल हुए छह सांसदों पर बेहद तीखा हमला बोला। अन्ना हजारे ने दल-बदल करने वाले नेताओं की नीयत पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसे लोगों में न श्रद्धा होती है, न निष्ठा और न ही कोई विचारधारा। जो लोग देश और समाज के लिए समर्पित होते हैं, वे कभी पार्टी नहीं बदलते, दल-बदल केवल स्वार्थ के लिए किया जाता है।
आरटीआई कानून में संशोधन के खिलाफ ५ जुलाई से आंदोलन की घोषणा करते हुए अन्ना हजारे ने महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीतिक उठा-पटक पर भी खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि आज राजनीति में सिद्धांत और ध्येयवाद खत्म होते जा रहे हैं और सत्ता तथा व्यक्तिगत फायदे के लिए नेता अपनी पुरानी विचारधारा तक छोड़ने को तैयार हैं।
शिवसेना से छह सांसदों के शिंदे गुट में शामिल होने के पैâसले पर प्रतिक्रिया देते हुए अन्ना हजारे ने कहा कि दल-बदल लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। इससे जनता का विश्वास कमजोर होता है और राजनीति का नैतिक आधार भी खत्म होता है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों के भीतर देश और समाज के प्रति समर्पण की भावना होती है, वे किसी भी परिस्थिति में अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करते।
अन्ना हजारे ने यह भी कहा कि अगर देश में वास्तव में विचारशील और सिद्धांतवादी लोग सत्ता में आए, तो दल-बदल पर और कठोर कानून बनाया जा सकता है। अन्यथा स्वार्थ की राजनीति लोकतंत्र को कमजोर करती रहेगी। शिवसेना सेना के छह सांसदों के शिंदे गुट में जाने के बाद पहले से गर्म महाराष्ट्र की राजनीति में अन्ना हजारे के इस बयान ने नया विस्फोट कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में इसे शिंदे गुट में गए सांसदों पर अब तक का सबसे करारा नैतिक हमला माना जा रहा है।
‘दल-बदल से खत्म होता है जनता का भरोसा’
अन्ना हजारे ने कहा कि सत्ता और निजी स्वार्थ के लिए विचारधारा छोड़ने वाले नेता लोकतंत्र को कमजोर करते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि दल-बदल की बढ़ती प्रवृत्ति राजनीति के नैतिक मूल्यों को खत्म कर रही है और ऐसे नेताओं पर कड़े कानून की जरूरत है।
