महाराष्ट्र का आर्थिक अनुशासन कितना बिगड़ गया है, इसका पुख्ता सबूत खुद राज्य की महायुति सरकार ने ही विधिमंडल में पेश कर दिया है। विधिमंडल अधिवेशन के पहले ही दिन सरकार ने ९७ हजार ७०६ करोड़ ४० लाख रुपए की पूरक मांगें पेश कीं। राज्य का वार्षिक बजट पेश हुए मुश्किल से तीन महीने ही हुए हैं, फिर भी सरकार के आर्थिक अनुमान कहें या नियोजन पूरी तरह फेल हो गए और ९० दिन के भीतर ही अतिरिक्त खर्च के लिए पूरक मांगें पेश करने की नौबत सरकार पर आ गई। बजट के तुरंत बाद पूरक मांगों का कटोरा लेकर खड़ा होना, किसी भी सरकार के लिए शर्म की बात ही कही जाएगी। अनुत्पादक कार्यों पर होने वाली फिजूलखर्ची इस एकमात्र कारण से राज्य सरकार का आर्थिक नियोजन पूरी तरह से उलझ गया है। बजट में रखे खर्च के अलावा अचानक पैदा होने वाले खर्च या आपातकालीन चीजों के लिए लगनेवाले खर्च के लिए ही पूरक मांगों का प्रावधान संविधान निर्माताओं ने संविधान में किया था। पर इस मापदंड को वर्तमान में सभी राज्य सरकारें ताक पर रखती दिख रही हैं। कभी आर्थिक अनुशासन के मामले में महाराष्ट्र का नाम बहुत अच्छा था। लेकिन पिछले चार सालों में यह नाम पूरी तरह मिट गया। पिछले चार सालों में महायुति सरकार ने पूरक मांगों की झड़ी लगा दी है। दिसंबर २०२२ में ५२ हजार करोड़, मार्च २०२३ में करीब साढ़े छह हजार करोड़, दिसंबर २०२३ में ५५ हजार ५२० करोड़, फरवरी २०२४ में आठ हजार ६०० करोड़, जून २०२४ में करीब ९५ हजार करोड़, जुलाई २०२५ में ५७ हजार ५५० करोड़, दिसंबर २०२५ में ७५ हजार करोड़ से ज्यादा और अब जून २०२६ में पूरे ९७ हजार करोड़ मतलब लगभग
पांच लाख करोड़ के
दायरे में ये पूरक मांगें की गईं। बजट के बाहर खर्च का यह विश्व-रिकॉर्ड है। किसी योजना के लिए मंजूर किया गया पैसा साल के अंत में कम पड़ जाए या अचानक कोई नई योजना शुरू करनी पड़े, तो अगले बजट से कुछ दिन पहले सरकार अतिरिक्त पैसा पूरक मांगों के जरिए प्राप्त करे, ऐसा शुद्ध इरादा पूरक मांगों के पीछे होना चाहिए। लेकिन वर्तमान में मुख्य बजट में जानबूझकर प्रावधान छिपा दिए जाते हैं और राजनीतिक मकसद सामने रखकर हजारों करोड़ रुपए पूरक मांगों के जरिए मंगवाए जाते हैं। इस बार तो सरकार ने सारी हदें पार कर दीं। अगले बजट में अभी नौ महीने बाकी हैं, फिर भी पहले तीन महीनों में ही सरकार के आर्थिक अनुमान, खर्च के अनुमान और कुल मिलाकर नियोजन पूरी तरह धराशायी हो गए और सरकार को ९७ हजार करोड़ से ज्यादा यानी लगभग एक लाख करोड़ की पूरक मांगें पेश करनी पड़ीं। आश्चर्य की बात ये है कि राज्य में महाविकास आघाड़ी सरकार थी तब आज की अपेक्षा बहुत कम राशि की पूरक मांगें विधिमंडल में लाने पर भी तत्कालीन विपक्ष के नेता कड़ी आलोचना करते थे। ‘‘देखो, इस सरकार ने वैâसे आर्थिक अनुशासन बिगाड़ दिया’’, कहकर भरपूर खरी-खोटी सुनाते थे। वही विपक्ष के नेता आज राज्य के मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री भी हैं। अब पूरक मांगों का आंकड़ा चार साल में पांच लाख करोड़ के आंकड़े में पहुंच गया, लेकिन उन्हें यह आर्थिक अव्यवस्था नहीं लगती। बजट के बाद तीन महीने में ही अगर किसी सरकार को पूरक मांगें लेकर आना पड़ रहा है, तो सरकार ने जो पेश किया था वो
बजट कितना झूठा
था, इसी बात का यह खुला कबूलनामा है। उदाहरण ही देना हो तो ९७ हजार करोड़ की ताजा पूरक मांगों में सरकारी दफ्तरों के बिजली बिलों के लिए ४ हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। सरकारी दफ्तरों को बिजली का बिल देना पड़ता है, ये बजट पेश करते समय सरकार को क्या पता नहीं था? सिंहस्थ कुंभमेले के लिए ३ हजार करोड़, विभिन्न परियोजनाओं, योजनाओं का खर्च, ब्याज का भुगतान, अलग-अलग वर्गों की छात्रवृत्ति योजनाएं, आंगनवाड़ी सेविकाओं का मानदेय, ऐसी अनेक वजहों के लिए पूरक मांगों के जरिये हजारों करोड़ मांगे गए हैं। एक तरफ सरकार पर बढ़ता कर्ज का बोझ और दूसरी तरफ सरकार के राजस्व आय में आई कमी, इन दोनों की वजह से महाराष्ट्र सरकार की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। लगभग ११ लाख करोड़ तक पहुंचा कर्ज, इस कर्ज के सिर्फ ब्याज के भुगतान के लिए हर साल लगने वाला ६० हजार करोड़ का बोझ और सरकारी खजाने की मनमानी तरीके से हो रही फिजूलखर्ची इन सबकी वजह से महाराष्ट्र सरकार की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है। इसीलिए बजट के बाद महज ९० दिन में ही ९७ हजार करोड़ की पूरक मांगें लेकर आने की शर्मनाक नौबत सरकार पर आ पड़ी। अर्थशास्त्र के विद्यार्थी को परीक्षा में उत्तरपत्रिका के साथ पूरक पन्ने जोड़ने पड़ें और असल में रिजल्ट आने पर पूरकबहादुर विद्यार्थी मुश्किल से पास हो, ठीक वैसा ही यह मामला है। महाराष्ट्र का ‘पूरक’बहादुर सरकार कभी अनुशासनप्रिय माने जाने वाले राज्य की अर्थव्यवस्था की खुलेआम धज्जियां उड़ा रही है!
