मुख्यपृष्ठस्तंभपूर्व सांसद केपी यादव की नियुक्ति से सिंधिया को झटका

पूर्व सांसद केपी यादव की नियुक्ति से सिंधिया को झटका

प्रमोद भार्गव
मध्य प्रदेश की राजनीति आजकल अर्से से लंबित निगम मंडल में अध्यक्षों की नियुक्ति के कारण गरमाई हुई है। इन नियुक्तियों में सर्वाधिक चर्चा गुना लोकसभा सीट से पूर्व सांसद रहे केपी यादव की नियुक्ति को लेकर है। उन्हें मध्यप्रदेश राज्य खाद्य आपूर्ति निगम के अध्यक्ष पद पर मनोनीत किया गया है। केपी यादव वही हैं, जिन्होंने भाजपा उम्मीदवार के रूप में २०१९ के लोकसभा चुनाव में गुना सीट से कांग्रेस उम्मीदवार ज्योतिरादित्य सिंधिया को करारी हार का मुंह दिखा दिया था। इस हार के बाद ही सिंधिया भाजपा में कांग्रेस के २२ विधायकों के साथ शामिल हुए और कांग्रेस की कमलनाथ सरकार को अपदस्थ कर दिया था। बाद में सिंधिया को राज्यसभा का सदस्य बनाया गया और २०२४ के आम चुनाव में केपी का टिकट काटकर उन्हें गुना-शिवपुरी से लोकसभा का उम्मीदवार बना दिया गया था। यहां से उन्हें जीत मिली और प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें केंद्रीय संचार एवं पूर्वोत्तर राज्यों के मंत्री की शपथ दिला दी।
एक समय केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के करीबी रहे और बाद में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बने केपी यादव का प्रभाव गुना लोकसभा क्षेत्र के कोलारस, अशोकनगर, चंदेरी और मुंगावली में यादवों का बाहुल्य होने के कारण है। अतएव २०२४ के चुनाव में यादव मतदाता सिंधिया से रूठा हुआ लग रहा था। इसकी जानकारी जब अमित शाह को मिली तो उन्होंने अशोकनगर में एक बड़ी सभा को संबोधित करते हुए वचन दिया कि आप लोगों को केपी यादव की चिंता करने की जरूरत नहीं है, सही समय आने पर उनके हितों का ख्याल रखने का दायित्व मुझ पर छोड़ दिजीए। मतदाताओं ने शाह के इस वचन पर भरोसा किया और सिंधिया के पक्ष में मतदान किया। इसी का परिणाम रहा कि शाह ने केपी यादव की नियुक्ति निगम अध्यक्ष के रूप में करा दी। राजनीतिक हलकों में ऐसी चर्चा है कि यह नियुक्ति सिंधिया को रास आने वाली नहीं है।
दरअसल, सिंधिया के भाजपा में राजतिलक के बाद केपी का वर्चस्व गुना संसदीय क्षेत्र में फीका पड़ गया था। राजनीति में तो उनकी अनसुनी हो ही रही थी, नौकरशाही भी घास नहीं डाल रही थी। सिंधिया के भाजपा में आने से अकेले केपी यादव आहत हुए हों, ऐसा नहीं था, वे सब मूल भाजपाई, मंत्री, सांसद और विधायक सकते में आ गए थे, जिनका सिंधिया के कांग्रेस में रहते हुए कोई वास्ता नहीं रहा था। इसके इतर कुछ मंत्री तो सिंधिया पर हमला भी बोलते रहे थे। इनमें केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी शामिल थे। तोमर ग्वालियर से ही हैं और छात्र जीवन से ही संघ और भाजपा के साधारण एवं निष्ठावान कार्यकर्ता रहते हुए आज बड़े मुकाम पर हैं। उनके राजनीति के दायरे को सिंधिया से हमेशा चुनौती मिलती रही है। किंतु निगम और मंडल की नियुक्तियों में तोमर ने अपने वर्चस्व का परचम फहरा दिया है। ग्वालियर-चंबल अंचल से प्रमुख नियुक्तियां हुई हैं, उनमें से ज्यादातर तोमर और मुख्यमंत्री मोहन यादव की सफल रणनीति का पर्याय रही हैं। हालांकि, इन नियुक्तियों में कांग्रेस से भाजपा में आए नेताओं को भी स्थान मिला है। सिंधिया के गुट से केवल अशोक शर्मा को नगरीय विकास एवं आवास विभाग (साडा) का अध्यक्ष बनाया गया है। बाकी लोगों में महेंद्र यादव, मधुसूदन भदौरिया, सुधीर गुप्ता, वेद प्रकाश शिवहरे और हरीश मेवाफरोश शामिल हैं, जो नरेंद्र सिंह और मोहन यादव से जुड़े होने के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी जुड़े हैं।

प्रमोद भार्गव

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