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वट वृक्ष में है शिवतत्व

शीतल अवस्थी

वट पूर्णिमा के दिन वट वृक्ष के पूजन का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि वट वृक्ष शिवरूप है। इसलिए विवाहित महिलाएं वट वृक्षरूपी शिव का स्मरण कर अपने पति की लंबी आयु की प्रार्थना करती हैं। इससे उन्हें ब्रह्मांड में विद्यमान शिवतत्त्व का उचित लाभ मिलता है। वट वृक्ष का अध्यात्मिक दृष्टि से काफी महत्त्व है। वट वृक्ष में शिवतत्त्व को आकृष्ट कर उसे संजोए रखने एवं आवश्यकतानुसार वातावरण में प्रक्षेपित करने की क्षमता होती है। इसीलिए उसे शिवरूप मानते हैं। वट सावित्री के दिन वट वृक्ष में विद्यमान शिवतत्त्व अधिक मात्रा में सक्रिय रहता है। यही कारण है कि इस दिन वटवृक्ष के पूजन का विशेष महत्व है। वट वृक्ष के तने में तरंगों के रूप में शिवतत्त्व घूमता रहता है। वट वृक्ष के केंद्र बिंदु से चैतन्य की तरंगें प्रक्षेपित होती हैं।
वट वृक्ष की जड़ में भी शिवतत्व की चैतन्यमय तरंगों का अधिष्ठान होता है। जड़ से ये तरंगें निरंतर प्रवाहित होती रहती हैं। इन तरंगों के स्पर्श से ईश्वर प्राप्ति का उद्देश्य साध्य करने का भाव मन में जागृत होता है। वट सावित्री के दिन शिवतत्व की तरंगें क्रियाशक्ति से संबंधित होती हैं। इस कारण वट वृक्ष का पूजन करते समय किए गए मंत्रपाठ से स्त्रियों में विद्यमान शक्तितत्त्व जागृत होता है। वट वृक्ष का पूजन करते समय स्त्रियां उसके तने पर सूत्रवेष्टन करती हैं, अर्थात तने पर सूती धागा लपेटती हैं। इस धागे के तीन घेरे बनाए जाते हैं। सूत्रवेष्टन के इन तीन घेरों के कारण इच्छा, क्रिया एवं ज्ञान, इन तीन शक्तियों के बल पर महिलाओं की मनोकामना पूर्ण होती है। सूत्रवेष्टन के समय स्त्रियों के भावानुसार तने में विद्यमान शिवतत्त्व से संबंधित तरंगें संचालित होती हैं। ये तरंगें धागे में संचारित होती हैं।
मृत्यु के देवता यमराज और सावित्री ने तीन दिनों तक वट वृक्ष के नीचे ही शास्त्र चर्चा की थी। इसी कारण सावित्री के साथ वट वृक्ष का संबंध जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि प्रलय के उपरांत सब कुछ नष्ट हो जाता है, परंतु वट वृक्ष रह जाता है। वह युगांत का साक्षी है। बाल मुकुंद ने प्रलय काल में वट पत्र पर ही शयन किया था। प्रयाग के अक्षय वट के नीचे ही भगवान श्रीराम-लक्ष्मण एवं माता सीता ने विश्राम किया था। यहां तक कि त्रिदेवों का निवास भी वटवृक्ष ही है। बरगद, पीपल, औदुंबर तथा शमी पवित्र और यज्ञवृक्ष बताए गए हैं। परंतु इन सभी वृक्षों में वट वृक्ष की आयु अधिक होती है। तीर्थों में पंचवटी का महत्त्व है। पांच वटों से युक्त स्थान को पंटवटी कहा गया है। अगस्त्य के परामर्श से श्रीराम ने सीता व लक्ष्मण के साथ वनवास काल में यहां निवास किया था। वट वृक्ष दीर्घकाल तक अक्षय रहता है। अक्षय सौभाग्य तथा निरंतर अभ्युदय की प्राप्ति के लिए वट वृक्ष की आराधना की जाती है।
वट वृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पति को पुन: जीवित किया था। तब से यह व्रत ‘वट सावित्री’ के नाम से जाना जाता है। इसमें वट वृक्ष की पूजा की जाती है। महिलाएं अखंड सौभाग्य एवं परिवार की समृद्धि के लिए यह व्रत करती हैं। इस दिन सुबह सिर से नहाकर निर्जल व्रत रखा जाता है। पूजन सामग्री में जल, रोली, हल्दी, अक्षत, भीगा चना, फूल, दीप और धूप जैसी सामान्य वस्तुओं के साथ हाथ से काता गया सूत विशेष रूप से होता है। विधिपूर्वक पूजा करने के बाद जल चढ़ाया जाता है और सूत को हल्दी में रंग कर बरगद के चारों ओर तीन, सात, सत्रह या एक सौ आठ बार परिक्रमा करते हुए बांध दिया जाता है। इसके बाद सावित्री और सत्यवान की कहानी भी कही जाती है। सभी सुहागनें सज-धजकर बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। सारे दिन का उपवास रखा जाता है और शाम को पूजा के बाद भोजन किया जाता है।

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